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	<title>विचार मीमांसा : ताज़ा हिंदी समाचार सम्रिक्षा : हिंदी साहित्य : हिंदी विचार-विमर्श: हिंदी फीचर</title>
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	<description>ताज़ा हिंदी समाचार सम्रिक्षा : हिंदी साहित्य : हिंदी विचार-विमर्श: हिंदी फीचर</description>
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		<title>&#8216;हंस&#8217; के संपादक राजेन्द्र यादव  को  एक चेतावनी  !!</title>
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		<pubDate>Tue, 07 Feb 2012 17:07:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>VICHARMIMANSA DESK</dc:creator>
				<category><![CDATA[चाबुक]]></category>
		<category><![CDATA[विचारमीमांसा विशेष]]></category>
		<category><![CDATA['हंस' के संपादक राजेन्द्र यादव]]></category>
		<category><![CDATA[डॉ. दीप्ती गुप्ता]]></category>

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		<description><![CDATA[राजेन्द्र यादव जी, नारी-विमर्श को लेकर अपने विकृत दृष्टिकोण का परिष्कार कीजिए………! राजेन्द्र जी, ‘हंस’ के अक्टूबर अंक 2010 में ‘तुम्हीं ने तो दिए हैं ये हथियार’ शीर्षक के तहत आपका सम्पादकीय पढ़ा. मुझे बेहद आश्चर्य हुआ कि आप दबंगई ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;"><strong>राजेन्द्र यादव जी, नारी-विमर्श को लेकर अपने विकृत दृष्टिकोण का परिष्कार कीजिए………!</strong></p>
</blockquote>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.vicharmimansa.com/wp-content/uploads/2012/02/rajendra-yadav-editor-hans-magazine.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-5156" title="rajendra yadav editor hans magazine" src="http://www.vicharmimansa.com/wp-content/uploads/2012/02/rajendra-yadav-editor-hans-magazine-300x245.jpg" alt="rajendra yadav editor hans magazine 300x245  हंस के संपादक राजेन्द्र यादव  को  एक चेतावनी  !! " width="300" height="245" /></a>राजेन्द्र जी, ‘हंस’ के अक्टूबर अंक 2010 में ‘तुम्हीं ने तो दिए हैं ये हथियार’ शीर्षक के तहत आपका सम्पादकीय पढ़ा. मुझे बेहद आश्चर्य हुआ कि आप दबंगई और उद्दम मैक्सिकन चित्रकला व टेंगो, डिस्को, रॉक आदि आधुनिक संगीत को एक क्रान्ति एवं विद्रोहपूर्ण प्रतिक्रिया का परिणाम बता कर, ‘फेमिनिज्म’ को भी कुछ इसी तरह की विध्वंसात्मक परम्परा का अनुगामी घोषित करके, उसे ‘देह के तल’ पर तौलते हुए एक बार फिर पहले जैसा अनर्गल राग अलापने लगे ! मुझे ‘नारी विमर्श’ के विषय में उसकी देह पर अटकी आपकी नज़र का औचित्य आज तक समझ नहीं आया ! यानी कि नारी-विमर्श = देह-विमर्श, ‘नारी-मुक्ति’ बनाम ‘देह-मुक्ति’, मतलब कि देह के स्तर पर नारी का उन्मुक्त और बेलगाम हो जाना &#8211; आपके अनुसार ये ही नारी मुक्ति का अर्थ है, यह ही नारी मुक्ति की शुरुआत है ! पहले आलेखों की तरह, अपने इस आलेख में भी आप नारी की यौनिक आजादी की चिंता में घुले जा रहे हैं ! नारी ‘मात्र देह ही’ क्यों दिखती है आपको ? आप क्यों नहीं समझना चाहते कि वह इंसान पहले है, ‘नारी’ बाद में ! उसका एक मानसिक और भावनात्मक जगत भी है जो पुरुष से अधिक सबल और प्रबल है ! वह मानसिक और भावनात्मक पाबंदियों से मुक्त होने के लिए जितनी छटपटाती रही है, उतनी शारीरिक रूप से मुक्त होने के लिए कभी आकुल नहीं रही ! आप क्योंकर पिछले कई वर्षों से इस गंभीर और संवेदनशील विषय की छीछालेदर किए जा रहे हैं&#8230;..खैर, इस असली मुद्दे पर मैं आपकी गलतफहमियां बाद में दूर करूँगी, पहले आपके सम्पादकीय पर, शुरुआत से लेकर अंत तक बारीकी से सूक्ष्म विमर्श करते हुए, आपके द्वारा अनेक स्थानों पर प्रस्तुत भ्रामक तथ्यों और आपत्तिजनक बातों की ओर विनम्रता के साथ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगी !</p>
<p style="text-align: justify;">आपने आलेख की शुरुआत में मैक्सिकन कला में अभिव्यक्त जिस ऊर्जा, दबंगई, हिंसा और उद्दामता के उदगम की जानकारी दी है, वह एकदम भामक है. यदि आप मैक्सिकन कला के जानकार हैं तो आपको मालूम होना चाहिए कि प्रसिध्द मैक्सिन कलाकारों Orozco, Rivera, Siqueiros की चित्रकला जनसाधारण से जुडी, सैध्दांतिक और शिक्षापरक थी !</p>
<p style="text-align: justify;">उनके चित्र मैक्सिन माइथोलौजी और इतिहास को प्रतिबिंबित करते थे ! उन्होंने मैक्सिन क्रान्ति के लक्ष्यों, उसकी पृष्ठभूमि और कामगार लोगों के संघर्ष को उकेरा ! खासतौर से ‘हाथों’ को दर्शाने वाली अधिकांश पेंटिग (१९३०) मेहनत और कर्मठता से हासिल, प्रोलेटेरियन वर्ग की ‘ताकत’ की प्रतीक थी ! सामाजिक संचेतना और कम्यूनिज्म से जुड़े राजनीतिक संदेशों से भरपूर इन कलाकारों के चित्रों में, कहीं भी साँप, बिच्छू. बिल्ली कुत्ते आदि के माध्यम से कुछ भी नहीं दर्शाया गया ! मैक्सिन कलाकारों की विश्व भर में प्रसिध्द कलाकृतियों के लिए आपकी यह साँप, बिच्छू, कुत्ते, बिल्ली आदि की कोरी कल्पना मुझे मान्य नहीं है ! मतलब कि कलाकारों के विद्रोह के उपादान ‘मानवीय चेहरों’ के क्रोध, आक्रोश, दुःख और पीड़ा के भाव थे तो कही ‘हाथ’ ताकत और कर्मठता के प्रतीक बन कर उभरे ! उन माने हुए कलाकारों ने बड़े शानदार ढंग से मैक्सिकन क्रान्ति और विद्रोह को दर्शाया !</p>
<p style="text-align: justify;">इसी से जुडा दूसरा बिंदु है कि &#8211; योरोपियन कला मर्मज्ञों ने मैक्सिकन कला को किसी तरह की विवशता के तहत नहीं स्वीकारा ! मैक्सिकन कला की ऊर्जा और उद्दामता, खास सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियों और संदेशों को झलकाती थी, इसलिए मन पर प्रभाव छोडने के कारण, सौफ्ट योरोपियन कला मर्मज्ञों ने उसे उदारता से सराहा, स्वीकारा, न कि विवशता से ! इसी तरह, समय के साथ परिवर्तित, संगीत ‘सौफ्ट’ से ‘हार्ड’ रूप में ढल कर, टेंगो, डिस्को, रॉक के उद्दाम ध्वनि तरंगों रूप में सामने आया तो बीसवीं सदी के युवाओं के लिए मनोरंजन के साथ &#8211; साथ, अपनी अतिरिक्त ऊर्जा और शक्ति को निष्कासित करने का माध्यम बना ! राजेन्द्र जी, तेज़ &#8211; तीखी धुनों वाला, वाद्यों के शोर से भरपूर आधुनिक संगीत किसी विद्रोह या क्रान्ति का प्रदर्शन के रूप में नहीं अपितु संसार के, प्रकृति के ‘परिवर्तन चक्र’ के तहत एक नवीन रूप में सामने आया है !</p>
<p style="text-align: justify;">आपने इसी पैराग्राफ में लिखा है &#8211; ‘असभ्य नीग्रों जातियों’&#8230;.शायद आपको जानकारी नहीं है कि ‘नीग्रो’ शब्द का प्रयोग लंबे समय से उसी तरह से निषिध्द (Banned) है. जैसे कि हमारे देश में ‘जातिसूचक विशिष्ट’ शब्द ! आगे से, आलेख लिखते समय ऐसे शब्दों के प्रयोग के साथ सावधानी बरतें क्योंकि आप एक लेखक, विचारक और संपादक तीनों का दायित्व ओढें हैं ! हंगामा बरपा करने वाले शब्दों से परहेज़ ज़रूरी होता है, खासतौर से ‘संपादक’ के लिए ! कुछ समय पहले आपने देखा नहीं था कि एक प्रसिध्द पत्रिका के संपादक द्वारा अपने सम्पादकीय दायित्व को हल्केपन से लेने के कारण, ‘छिनाल’ शब्द ने कैसा तूफान खडा कर दिया था ? उस तूफ़ान की विपरीत हवाएँ बड़ी देर बाद थमी थी !</p>
<p style="text-align: justify;">आगे इसी सन्दर्भ में आपने दलितों के दमन का हवाला भी दिया है ! इस तरह ‘दमन और दलन’ की भूमिका बाँधते हुए, आपने असली मुद्दे ‘नारी दमन’ पर आकर, ‘फेमिनिज्म’ के बारे में अपने बासी ‘मायोपिक’ विचार परोस कर मनीषी पाठकों का हाज़मा खराब कर दिया ! जैसा कि आप और हम सभी यह अच्छी तरह जानते हैं कि ‘’स्त्री दमन’ हमेशा से न जातिपरक था, न धर्मपरक था और न देशपरक था बल्कि वह स्त्री और पुरुष में भेद-भाव करने वाला ‘लिंगपरक’ था जो मर्दवादी व्यवस्था की रुग्ण मानासिकता के कारण जन्मा था ! सदियों से मर्दों के ‘एक विशाल वर्ग’ के अंदर छुपी ‘तर्कहीन’ असुरक्षा की भावना और थोथे अहं के कारण, नारी दमन और निषेधन के दायरों में कैद रही है ! जन्मते ही, दबने व सहने की खाद उसके चारों ओर जम कर थोपी जाती रही ! इतना ही नहीं, उस थुपी स्त्री पर सँस्कारों के छींटे मार &#8211; मार कर, उस बेचारी की ऐसी ‘सघन कंडीशनिंग’ की गई कि वह दबने, हर ओर से अपने को ‘विदड्रा’ करके जीने को ही अपनी नियति मानने लगी ! यहाँ तक कि अपने चारों ओर खींचे गए दायरों से बाहर निकलना अपराध समझने लगी (सौजन्य से &#8211; ‘मनुस्मृति’) ! यहाँ आप यह न भूलें कि आपने बार-बार जिस कंडीशनिंग का हवाला दिया है, वह इंसान के -चाहे वह नारी हो या पुरुष &#8211; मानसिक जगत से जुडी होती है &#8211; देह से नहीं ! समाज में सदा से विराजमान ‘मर्दवादी व्यवस्था’ के चलते स्त्री का पलट कर जवाब देना, अपनी स्वीकृति-अस्वीकृति, सहमति-असहमति जताना, व्यक्तिगत, घरेलू व बच्चों के मामले में अपने आप निर्णय लेना आदि भी उसके लिए निषिध्द रहा &#8211; मतलब कि किसी भी जगह वह आत्मनिर्भर और आज़ाद नहीं थी ! ये निषिध्दताएँ स्त्री के दिलो-दिमाग यानी विचारों और भावों के साथ इस तरह एकाकार कर दी गई कि आज इक्कीसवीं सदी में भी वह अपने द्वारा लिए गए निर्णयों को लेकर तब तक आश्वस्त नहीं होती, जब तक वह पिता, भाई या पति से सलाह &#8211; मशविरा नहीं कर लेती ! सलाह &#8211; मशविरा करना बुरा नहीं है &#8211; बुरी है वह मानसिकता, जो सदियों से उस पर हावी रही &#8211; हर बात में पुरुष पर निर्भर होने की, बात-बात में उसका मुँह तकने की ! औरत पति से पहले भोजन कर ले कभी तो, अपराधबोध से भर उठती है, किसी अपेक्षित काम के सिलसिले में एक से अधिक बार घर से अनुपस्थित रहे, तो भी अपराधी महसूस करती है ! वह घर और बाहर के ज़रूरी कामों को जिस जिम्मेदारी निबटाती है, उसकी उस भावना को नज़रंदाज़ करके पति ‘अनुपस्थिति’ को लेकर नाराज़ होकर शिकायतों का अम्बार लगाता नज़र आता है ! इसी तरह, यदि पति आफिस के बाद मित्रों के साथ समय काट कर देर से घर लौटता है या कोई शराबी पति नशे में चूर होकर, रात को देर से घर आता है, तो उस पर नाराज़ होना तो दूर, वह देर से आने का कारण भी नहीं पूछ सकती ! पत्नी का फ़र्ज़ है, ‘खामोश जुबान’ के साथ बाहर घूम फिर कर आए, थके पति को सम्हालना, भोजन देना, उसकी लतों और लातों को झेलना ! इसी तरह, कभी किसी सामाजिक कार्यक्रम में जाने का मन न हो तो, पति से ‘ना’ कहते हुए संकोच करना, उसकी नाराज़गी के अंदेशे से डरना &#8211; मतलब कि इन साधारण बातों में भी अपनी मर्जी जताने के लिए स्वतन्त्र न होना ! इन छोटी-छोटी रोज़मर्रा की बातों से लेकर बड़े-बड़े कुछ ऐसे सार्वकालिक महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं जिन पर हमेशा पुरुष व्यवस्था की तलवार टंगी रही है ! आप ही ज़रा सोचिए कि ये बन्दिशें स्त्री की देह से जुडी हैं या उसके मानसिक और भावनात्मक जगत से ? फिर आप नारी-विमर्श को देह के स्तर पर सुलझाने पर क्यों लगे हैं ? सृष्टि के आरम्भ से चली आई स्त्री की अनुशासित यौनिकता जिसे वह अपने पति तक सीमित रखने में विवाह संस्कार की गरिमा मानती रही, आप उसे खंडित करने में नारी- मुक्ति की उपलब्धि कैसे मान रहे हैं ? बल्कि एक सर्वेक्षण के अनुसार पहले भी और आज भी, नारी के लिए सिर्फ अपनी ही नहीं, अपितु पुरुष की भी अनुशासित यौनिकता ही काम्य रही ! लेकिन अफसोस कि पुरुष ने मनु के ज़माने से ही, न तो नैतिकता की खातिर और न परिवार की खातिर, परनारी की ओर फिसलती अपनी भावनाओं और यौनिकता को अनुशासित करना चाहा ! उसकी वह प्रवृति आज तक बरकरार है ! इस गंभीर मसले में आप पुरुष यौनिकता को अनुशासित करने की गुहार लगाने के बजाए, उलटे, स्त्री को यौनिक आजादी दिलाने की बात कर रहे हैं ! इतना ही नहीं, दूसरी ओर आप, पारिवारिक बिखराव के प्रति भी चिंतित हैं ! बिखरे परिवारों के मद्दे नज़र, आपका ‘देह-मुक्ति का यह अटपटा फलसफा तो परिवारों को और अधिक तहस &#8211; नहस ही करेगा, उन्हें समेटेगा नहीं ! इससे परिवार मिटेगें ही, बनेगें नहीं. विवाह संस्था ही समाप्त हो जाएगी ! हमें समाज को अधिक सुगठित बनाने के लिए वैवाहिक संस्था को बचाना चाहिए, परिवारों को टूटने से बचाना चाहिए कि उन्हें ध्वस्त करने की राह पर चलाना चाहिए ?</p>
<p style="text-align: justify;">इस सन्दर्भ में आगे आप लिखते है कि पहले की तुलना में परिवारों का बिखराव अधिक हो गया है ! इसका कारण आपके लेख से जो ध्वनित होता है &#8211; वह है नारी की उन्मुक्तता ! जबकि सच्चाई यह है कि आज नारी की आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उसे मर्दवादी दबाव को झेलने की विवशता से उबरने की सामर्थ्य दी है ! नारी कभी भी घर को नहीं बिखेरती अपितु उसकी भरसक कोशिश रहती है कि उसका घर बना रहे, लेकिन जब पुरुष अराजकता की हद ही हो जाती है, तो आज की आर्थिक रूप से स्वतंत्र नारी अपने अस्तित्व को कुचल कर निबाह करने के लिए विवश नहीं होती ! यहाँ एक और सच्चाई का खुलासा करना चाहूँगी कि परिवार और वैवाहिक जीवन आज ही नहीं, बल्कि पहले भी टूटे और बिखरे होते थे ! बस अंतर इतना था कि सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण पति-पत्नी दबे- ढके एक छत के नीचे अलग-अलग ज़िंदगियाँ जीते रहते थे ! पत्नियाँ बच्चों और घर-गिरस्ती में अपने मन को बहलाए रखती थीं और पति बाहर मन बहलाते थे ! आज के जोड़े खास कारणों से, साथ रहना नामुमाकिन हो जाने पर, एक छत के नीचे रहने का दिखावा नहीं करते !</p>
<p style="text-align: justify;">मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि आप रह-रह कर स्त्री को शारीरिक रूप से मुक्त होने के लिए क्यों ललकार रहे हैं &#8211; मतलब कि परोक्ष रूप से आप उसे व्यभिचारी होने का सुझाव क्यों दे रहे हैं ? यह आपकी दृष्टि का दोष है या सोच का खोट ? क्योंकि एक ओर आप उसे एक जीर्ण- शीर्ण कंडीशंड मानसिकता से निकालने की बात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर, प्रकारांतर से आप उसे ‘सैक्सुअल एब्यूज’ के लिए ‘कंडीशंड’ होने की सलाह दे रहे हैं ! आपके नारी &#8211; विमर्श पर अक्सर ऐसे आलेखों को पढकर, कभी-कभी मै सोचती हूँ कि इसमें आपका भी दोष नहीं क्योंकि अक्सर अंतर्मन से विशुध्द मर्दवादी सोच वाले और ऊपर से नारी उध्दार के हिमायती, आप जैसे पुरुष ‘शुभचिंतक’ का चोगा पहन कर औरत को भटकाने के लिए ऐसे सुझाव देते देखे गए हैं जिनसे वह भुलावे में आकर, पहले से अधिक शोषित और दमित हो जाए ! ज़रा अपने मन को टटोल कर देखिए &#8211; कहीं ‘नारी मुक्ति’ को ‘देह-मुक्ति’ का पर्यायवाची बना कर, नारियों को मूर्ख बनाने की आपकी यह नई जोड़-तोड़ तो नहीं &#8211; जिससे वे व्यभिचार के मकडजाल में उलझाती जाएँ !</p>
<p style="text-align: justify;">एक स्थान पर आप लिखते हैं कि ‘पुरुष द्वारा खास वातावरण और सामाजिक मानसिकता तैयार की जाती है&#8230;’ आप क्यों भूल रहे हैं कि पौराणिक काल से समाज में पुरुष वर्चस्व रहा है , रामायण हो या महाभारत या आधुनिक युग में रची गई ‘कामायनी’ &#8211; ये सब ग्रन्थ पुरुषवर्चस्व की ही गाथा बांचते हैं, पुरुष-व्यवस्था की ही कहानी कहते है ! हर औरत सीता, द्रौपदी, श्रध्दा है &#8211; उसका जीवन बना ही अग्नि परीक्षा देने , दाँव पर लगने और त्याग और समर्पण करने के लिए हैं. राजेन्द्र जी, किसी औरत ने कभी नहीं चाहा कि उसके जीवन में कोई ‘इड़ा’ आए और उसके ‘मनु’ को भटकाए. यदि दुर्भाग्य से इड़ा बलात आ भी गई, तो पत्नी ने पति से भरपूर निष्ठा और वफादारी चाही ! तो पुरुष को ‘वातावरण और सामाजिक मानसिकता’ तैयार करने की ज़रूरत ही कहाँ रह जाती है ? समाज के वातावरण, व्यवस्था, चप्पे-चप्पे पर पुरुष का ही बोलबाला है, राज है, हर तरफ उसी की छाप है ! समाज चौबीस घंटे मर्दवादी व्यवस्था से स्पंदित है ! विडम्बना की बात यह है कि तब भी पुरुष आतंकित है, भयभीत है (शायद अपनी कुंठाओं के कारण) ! दूसरी ओर, नारी &#8211; शासित होकर भी इतनी हैरान, परेशान नहीं. जितना कि पुरुष उस पर शासन करके !</p>
<p style="text-align: justify;">जीवन में कोई भी स्थिति स्थाई नहीं रहती ! पतन के बाद उत्थान, उत्थान के बाद पतन आता ही है ! ‘यात्त्येकतोsस्तशिखरम पतिरौषधिनाम्, आविष्कृतो एकतोsर्क: ’ का नियम दमित नारी के उत्थान पर भी लागू हुआ ! पहले जो उसकी स्थिति थी उससे वह निश्चित रूप से उबरी ! प्रत्येक क्षेत्र में उसने अपनी क्षमता और प्रतिभा का परचम फहराया ! मर्दवादी ताकत से संचालित समाज में, जब-जब नारी ने साहस बटोर कर, अन्यायपूर्ण व्यवस्था को चुनौती दी &#8211; तब तब पुरुष ने परास्त महसूस किया ! नारी शक्ति और क्षमता को देख कर, पुरुष को खतरे दिखे और उसके अपने अस्तित्व को डिगा देने वाली चेतावनियाँ लहराती नज़र आई. ! जब कि स्त्री ने कभी भी पुरुष के अस्तित्व पर वार करने की नहीं सोची, अपितु समाज में अपनी खोई हुई, छीनी हुई जगह बनाने की न्यायपूर्ण लड़ाई लड़नी चाही ! शासक पुरुष वर्ग उसकी इस जायज़ माँग से बेबात डरता रहा और बदले में उस पर चीखता-चिल्लाता रहा ! वह आज तक उस निरर्थक भय से नहीं उबरा है. इसलिए ही तरह-तरह के पैंतरे बदल कर स्त्री को मानसिक और दैहिक कष्ट देने से बाज़ नहीं आता ! स्त्री की अवहेलना, आलोचना कर, भावनात्मक और मानसिक रूप से रौंद कर, शायद उसे एक (खोखले) दर्प और (रुग्ण) सुख का अनुभव होता है ! यह बात संवेदनशील और विचारशील पुरुषों पर लागू नहीं होती ! हमारे आस-पास ऐसे न्यायप्रिय और समझदार पुरुष भी हैं जिनकी सोच नारी-विमर्श को लेकर नितांत सुलझी हुई है ! यह भी हम नारियों के लिए सन्तोष की बात है ! नारी को यदि सामाजिक-साँस्कृतिक दायरों में बाँधने वाले पुरुष थे, तो उन दायरों से बाहर निकालने की जंग लड़ने वाले गांधी, गोखले, दयानंद सरस्वती भी पुरुष ही थे, लेकिन आप जिस कुंठित पुरुष तबके की बात करते आए हैं &#8211; वह कभी भी स्त्री हिमायती नहीं रहा ! मुझे कहने की ज़रूरत नहीं, आप खुद ही इस लेख में और अपने अन्य लेखों में भी, मर्दवादी व्यवस्था को कोंचते ज़रूर रहें हैं, लेकिन आप उस सोच से आज तक मुक्त नहीं हो पाए ! यदि मुक्त हो गए होते तो ‘नारी-मुक्ति ’ को ‘देह-मुक्ति’ का जामा न पहनाते !</p>
<p style="text-align: justify;">यह एक वैश्विक और ऐतिहासिक सत्य है कि समाज में किसी भी तरह का ‘बदलाव’ हमेशा मानसिक जगत से यानी &#8211; विचारों से जुडा होता है ! यही नियम, यही मनोविज्ञान नारी-मुक्ति पर भी लागू होता है ! देह को नारी ने कभी भी मुक्ति का मंच नहीं माना और न बनाया, वरन उसकी जिस देह पर पुरुष की गीध्द दृष्टि रही है &#8211; उस देह की रक्षा की कामना और उम्मीद उसने पुरुष से की है हमेशा !</p>
<p style="text-align: justify;">राजेन्द्र जी, आपका देह मुक्ति का सोच निरा थोथा, भोंडा, आधारहीन और हल्की सोच को दर्शाता है !</p>
<p style="text-align: justify;">आपका यह सोच कि ‘‘नारी को पतिता, कुलटा, छिनाल , फाहिशा कहना उसे गाली देना नहीं &#8211; बल्कि मर्दवादी सामंती चंगुल से छुटी स्त्री के लिए सामान्यतया प्रयुक्त ‘उपाधियाँ’ हैं और न जाने आज कितनी लडकियाँ, सामाजिक कार्यकर्ता व अभिनेत्रियाँ अपने लिए इन अपमानजनक शब्दों को सुनकर आनंदित होती हैं’’ – इस बारे में भी आप यह जान लीजिए कि अगर आप ‘वेश्या’ को भी वेश्या कहकर बुलाएगें तो वह भी कडुवाहट से भर कर, आप पर अभद्रता से वार करेगी और दस बीस छंटे &#8211; छंटे ‘अपशब्दों’ से आपको नवाजेगी ! फिर आज की पढ़ी लिखी, नौकरी पेशा, सामाजिक कार्यकर्ता महिला अपने लिए अवमानना पूर्ण शब्दों को सुनकर कैसे खुश हो सकती है ? खुश नहीं होगी वह, बल्कि यूँ कहिए कि आगबबूला होगी ! जैसे कि हाल ही में ‘छिनाल’ शब्द के खिलाफ वह भडकी और उसने आग उगली !</p>
<p style="text-align: justify;"><div class="simplePullQuote"></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>किसी की बेटी, बहन, पत्नी के रूप में जानी जाने वाली नारी के साथ &#8211; आधुनिक काल में एक और ‘सशक्त पहचान’ जुड गई है &#8211; जो पुरुष वर्चस्व से परे &#8211; उसकी अपनी कर्मठता और योग्यता से निर्मित हुई है ! अब से पहले भी और आज भी, किसी की बेटी, बहन, या पत्नी कहलाए जाने में उसने न तो कभी बुरा माना और न कभी किसी तरह का अपमान महसूस किया, वरन पिता, भाई, पति की पहचान से जुड कर प्यार और अपनेपन से ही भरती रही है ! अब यदि बदले समय, विकसित समाज के साथ, उसके अपने विकसित व्यक्तित्व और अस्तित्व को भी स्वीकृति मिलने लगी है, तो इसमें न तो वह इतरा रही है और न ही अपनी कर्मठता और योग्यता का बोझ अपने सिर पर उठाकर घूम रही है ! उलटे कुंठा का मारा ‘एक खास पुरुष वर्ग’ नारी की कर्मठता और योग्यता से हारा हुआ, नई नई, छिछोरी उपाधियाँ उस पर थोप रहा है ! इसमें नारी को लांछित करना और उसकी आलोचना करना कहाँ तक न्याय संगत है ? या ‘आप जैसे पुरुष इसलिए भय से ग्रस्त और त्रस्त है’ कि &#8211; स्त्री की दासता के बंधन खुलने लगे हैं और पुरुष वर्चस्व का अंतकाल आ गया है&#8230;.??’</strong></p>
<p style="text-align: justify;"></div>‘चरम सीमा’ कहानी की हो या जीवन की, हमेशा क्रान्ति लाने वाली होती है ! अगर आप ऐसा सोच ही रहे हैं तो उदारता से मान ही लीजिए न कि पुरुष वर्चस्व का ‘चरम’ ध्वस्त होगा &#8211; स्त्री-शक्ति से ही ! पर हाँ, उस स्थिति में भी, ध्वस्त-पस्त पुरुष का सहारा बनेगी नारी ही क्योकि स्वभाव से कोमल स्त्री उसे टूटते नहीं देख सकती ! भले ही वह पुरुष को माफ़ करे न करे, लेकिन अपनी इस नाराज़गी के रहते भी, वह उसके भले की ही सोचेगी !</p>
<p style="text-align: justify;">‘नारी द्वारा कागज़ पर कन्फैशंस लिखने से क्या तात्पर्य है आपका? यह कौन सा सुर लगाया आपने इस वाक्य के माध्यम से ? नारी क्यों कन्फैशंस करेगी भला ? कन्फैशंस करेगा वह ‘मर्दवादी संघ’ जो ‘विश्वासघात’ करता आया है ! बीते ज़माने में हर ओर से दबी &#8211; ढकी मजबूर नारी अपनी रक्षा के लिए ‘डिफेंसिव’ हुआ करती थी, लेकिन बदले समय के साथ, जब आपके ही भाई- बंधुओं ने उसकी आँखें खोली तो, वह अपनी क्षमता को पहचान कर ‘आफैन्सिव’ होना भी जान गई ! अपनी रक्षा हेतु ‘आफैन्सिव’ होना कोई गलत बात नहीं है, ‘आफैन्सिव’ होने पर उसने मर्दों को ‘प्रतिवार’ और ‘प्रतिकार’ का मौक़ा भी नहीं दिया ! यह उसकी समझदार रणनीति का प्रतिघाती दांव था जिसकी प्रतीक्षा करते-करते वह पिछली सदी से इस सदी में आ गई और धैर्य कायम रखते हुए, सही समय पर उसने अपनी शक्ति का परिचय दिया. राजेन्द्र जी, यह एक निर्विवाद सत्य है कि स्त्री सहज स्वाभाविक नारीमय रूप में रहकर ही अधिक सुकून और चैन पाती है. वह अपने अंदर छुपी शक्तियों का उपयोग सिर से पानी गुजर जाने पर ही करती है !</p>
<p style="text-align: justify;">आगे आपने एक बहुत ही आपत्तिजनक बात लिखी है &#8211; स्त्री, पुरुष वर्चस्व से भरे मर्दों द्वारा औरत के अंग-प्रत्यंगों पर गढी गालियों के रुग्ण व सड़े- गले अर्थ हटा कर, उन निकृष्ट शब्दो में नए अर्थ और मंतव्य भरेगी ? क्यों, यादव जी, स्त्री को क्या पागलपन का दौरा पड़ा है जो वह ज़बरदस्ती, पुरुष जुबान से निकली गालियों में ख़ूबसूरत अर्थ खोजेगी और भरेगी ? आप क्यों भूल रहें कि गाली तो गाली होती है ! ऎसी गाली गढने वालों के लिए स्त्री ‘काली’ और दुर्गा भी हो सकती है, यह जान लें आप !</p>
<p style="text-align: justify;">आपने जो ‘वाइफ स्वैपिंग’ की बात कही है, वह भी मर्दवादी शगल ही है ! आपको नहीं लगता कि इस ‘हाई सोसायटी खिलवाड’ के तहत मर्दवादी सोच ने औरतों को खिलौना बनाने की रीत चलाई ? इसी तरह, आपने यशपाल जी के माध्यम से ‘वेश्या को स्वतन्त्र नारी’ का प्रतीक बताया है ! माफ़ कीजिएगा, मेरा तो यह मानना है कि वेश्या से परतंत्र कोई दूसरी औरत नहीं होती ! किसी तरह जीवन निर्वाह करने के लिए, वह पैसे की गुलाम बन अनिच्छा से अपने शरीर का सौदा करती है ! औरत को कोठे पर बैठाने वाला भी हमेशा से मर्द ही रहा है ! वेश्या के परतंत्र जीवन की त्रासदी समझने के लिए, मैं चाहूँगी कि आप अमृतलाल नागर की पुस्तक ‘ये कोठेवालियाँ’ पढ़े ! अपनी मर्जी से कोई भी औरत न ‘तवायफ’ बनती है, न ‘बार गर्ल’ और न ‘वाइफ स्वैपिंग’ का खेल खेलना चाहती है, उसके पीछे &#8211; जैसा कि स्वयम आपकी कलम से निकला गया है &#8211; कि ‘’कोई न कोई लम्पट, औरतखोर पुरुष ही होता है &#8211; हवा में तो वह वैसी बनती नहीं !’’</p>
<p style="text-align: justify;">आपने ‘हंस’ में कहानी भेजने वाली लेखिकाओं पर भी फब्ती कसी है कि वे मन और शरीर से विचलित स्त्रियों और उनके अवैध संबंधों की कहानियाँ ही गढ़-गढ़ कर भेजती हैं ! वे ऐसा इसलिए कर रहीं हैं &#8211; क्योकि आप वैसी ही कहानियाँ छापना पसंद करते हैं. नैतिकता की बात कहती, पति-पत्नी की परस्पर वफादारी और एकनिष्ठ प्रेम की कहानियाँ आप पसंद ही नहीं करते !</p>
<p style="text-align: justify;">इसी तरह आप जींस पहनने वाली आज की नई पीढ़ी की लडकियों की आलोचना में जो कुछ भी कह रहे हैं, बेहतर होगा कि आप जींस और टाप में ढके लड़की के जिस्म को भेद कर देखने को लालायित कुत्सित प्रवृत्ति वाले पुरुषों की भर्त्सना करें ! माना कि मर्द के मन के विचलित होने का दोष आप आज की जींस और टाप पहनने वाली लड़की को देगें, लेकिन जब कोई भी सीधी सादी, शालीन वेशभूषा वाली लड़की या भोली मासूम बच्ची किसी की हवस का शिकार बनती है, तो उसमे कौन गुनाहगार है ? वास्तविकता यह है कि पुरुष को ही अपने दिलो-दिमाग पर नियंत्रण नहीं है ! अपने विचलन, फिसलन, हर गुनाह का ज़िम्मेदार वह औरत को ही ठहराता है ! पाप खुद करता है और सज़ा औरत के लिए मुकर्रर करता है ! महान है आप और आपकी मर्दवादी स सोच !</p>
<p style="text-align: justify;">इन प्रसंगों के बाद आपने अपनी सोच को नरम करते हुए ‘स्त्री को इंसान’ (आखिर मैं भी मनुष्य हूँ&#8230;.) कहा ! मुझे बहुत अच्छा लगा और अँधेरे में एक आशा की किरण सी दिखाई दी ! यदि आप नारी को इंसान मानते हैं तो सह्रदयता से यह भी तो सोचिए कि आज तक नारी के भावनात्मक (आत्मिक) और शारीरिक तलों में से &#8211; उसे कौन सा अधिक ईप्सित रहा, किस तल पर वह सर्वाधिक जीती रही है ? सौ नारियों का सर्वेक्षण करेगें तो आपको नब्बे नारियाँ भावनात्मक (आत्मिक) तल पर जीने वाली मिलेंगी ! आप ‘नारी मुक्ति’ का नारा लगा रहे हैं, नारी की मुक्ति की वकालत ज़रूर कर रहे हैं लेकिन अपने मन मुताबिक़ (देह के स्तर पर), नारी के मन के अनुसार नहीं ! इस मुक्ति अभियान में भी आप मर्दवादी मनमानी करना चाहते है ?</p>
<p style="text-align: justify;">आपने लिखा है कि – ‘हत्या, आत्महत्या, यातनाएं बर्दाश्त करके भी उसने (नारी) विद्रोह किए हैं&#8230;’ इस बात पर भी मैं आपसे असहमत हूँ क्योंकि मेरा यह मानना है कि मर्दवादी व्यवस्था के चलते जिस यातना, हत्या और शोषण से उसे मुक्ति नहीं मिली, उससे उसने हत्या और आत्महत्या के माध्यम से मुक्ति पा ली ! ‘हत्या और आत्महत्या’ उसका विद्रोह नहीं, मुक्ति रही ! सती, सावित्री के जिस बलिदान को आप नारी जाति की प्रशस्तियाँ बता रहे है, अगर उसका दूसरा पहलू देखें तो वह पुरुष के दुर्व्यवहार एवं उत्पीडन का मर्सिया है ! यहाँ यह भी स्पष्ट करना चाहूंगी कि ’देह-मुक्ति के संघर्ष और सरोकारों से स्त्री-विमर्श का व्याकरण तैयार नहीं हुआ’ बल्कि वैचारिक और भावनात्मक संघर्ष और सरोकारों से स्त्री-विमर्श का व्याकरण तैयार हुआ है ! इस सन्दर्भ में आप स्त्री-विमर्श के इतिहास के पन्ने पलटे और गौर करें कि ‘फेमिनिज्म’ की पहली लहर १८ वीं से २० वीं सदी में अमेरिका में ‘वोट का अधिकार’ पाने के लिए उठी थी. कहने की ज़रूरत नहीं कि वोट का अधिकार’ देह से नहीं सोच &#8211; समझ (मस्तिष्क) से जुडा है ! इसके बाद दूसरी लहर १९६० -१९८० के बीच उठी जो पहले से एक कदम आगे थी क्योंकि उसके तहत सामाजिक क्षेत्र में लिंगभेद आधारित असमानताओं को लेकर महिलाओं ने आवाज़ उठाई. साइमन द बुआ इस लहर की पुरोधा रही जिसने नारी को ‘अन्य’ (the other) माने जाने पर आपत्ति की. इसी तरह १९९० ऐ अब तक &#8211; तीसरी लहर ने इस विमर्श को और अधिक पुष्ट करते हुए, उसे ‘लिंग और जाति के इंटरसैक्शन’ पर फोकस किया. इस सबका सार था &#8211; ‘’ मर्दवादी व्यवस्था की मनमानी और अवमाननापूर्ण निषेधों को समाप्त कर, नारी की अपनी एक सम्माननीय पहचान बना कर जीने की स्वतंत्रता’’ !</p>
<p style="text-align: justify;">अब आप बताईए कि १८ वी सदी से लेकर आज तक चले आ रहे इस विमर्श में, नारी ने कब और कहाँ ‘देह के स्तर पर’ मुक्ति माँगी ? आप किस आधार पर और किस अधिकार से नारी-मुक्ति को ‘देह-मुक्ति’ से जोड़ते रहे हैं ?</p>
<p style="text-align: justify;">कुछ वर्ष पूर्व, आपकी ही तरह ‘ओशो’ (आचार्य रजनीश) ने भी देह से मोक्ष प्राप्ति का रास्ता लोगो को दिखाया था ! लोगों ने बड़ी उम्मीद से उनकी पुस्तक ‘&#8230;&#8230;&#8230; से समाधि तक&#8217; पढ़ी, लेकिन लोग मुक्त होने के बजाय, और अधिक देह लोभी और भोगी होते गए ! आज तक मैंने उनके किसी भी अनुयायी को मोक्ष प्राप्त करते नहीं देखा ! बल्कि उन मोक्षार्थियों को बेलौस उन्मुक्त और संसार में लिप्त ही पाया ! ओशो का देह द्वारा मोक्ष प्राप्ति का सिध्दांत निरा निर्थक और गलत साबित हुआ !</p>
<p style="text-align: justify;">तो जो सारे झगड़े की जड है, कबीर, तुलसी &#8211; सबने जिसे माया &#8211; मोह का द्वार कहा, आपका सारा चिंतन निरंतर उसी देह के इर्द-गिर्द क्यों घूमता रहता है ? मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि या तो आप अपनी इस देहवादी सोच का परिष्कार कीजिए या नारी-मुक्ति की बेसिर पैर की व्याख्या करना छोड़ दीजिए !</p>
<blockquote>
<p style="text-align: justify;">लेख को &#8220; <strong>जितेंद्र दवे साहब &#8221; द्वारा डॉ दीप्ती गुप्ता जी द्वारा प्रदत विशेषाधिकार के तहत &#8221; विचारमीमांसा डेस्क को प्रेषित किया गया. </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>लेखक : डॉ. दीप्ती गुप्ता </strong></p>
</blockquote>
]]></content:encoded>
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		<title>पुरुषों को जल्‍द मिलेगा कंडोम से छुटकारा</title>
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		<pubDate>Thu, 02 Feb 2012 21:47:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>VICHARMIMANSA DESK</dc:creator>
				<category><![CDATA[गपशप]]></category>
		<category><![CDATA[कंडोम का प्रयोग]]></category>
		<category><![CDATA[कंडोम का सही इस्तेमाल]]></category>
		<category><![CDATA[कंडोम कैसे इस्तेमाल करें]]></category>
		<category><![CDATA[क्या है कंडोम]]></category>

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		<description><![CDATA[पुरुषों के लिए अच्‍छी खबर है। अगर वे कंडोम का इस्‍तेमाल नहीं करना चाहते हैं तो उनके लिए एक नया गर्भनिरोधक आ गया है। वैज्ञानिकों ने पुरूषों के लिए बिल्कुल नए तरह का गर्भनिरोधक विकसित करने का दावा किया है। अनुसंधानकर्ताओं ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<blockquote>
<p style="text-align: justify;">पुरुषों के लिए अच्‍छी खबर है। अगर वे कंडोम का इस्‍तेमाल नहीं करना चाहते हैं तो उनके लिए एक नया गर्भनिरोधक आ गया है। वैज्ञानिकों ने पुरूषों के लिए बिल्कुल नए तरह का गर्भनिरोधक विकसित करने का दावा किया है। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल कर शुक्राणुओं की संख्या को इस स्तर तक कम किया जा सकता है, जिससे मनुष्यों में कुछ समय के लिए बंध्यता हो जायेगी।   अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि अभी यह देखना बाकी है कि इन गर्भनिरोधक का प्रभाव कितने समय तक रहेगा।   फिलहाल यह गर्भनिरोधक विकास के दौर में है।</p>
</blockquote>
<h1 style="text-align: justify;">कंडोम पहनकर नहीं आता मज़ा, तो ये कीजिए</h1>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.vicharmimansa.com/wp-content/uploads/2012/02/condom-out-for-mens.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-5121" title="condom out for mens" src="http://www.vicharmimansa.com/wp-content/uploads/2012/02/condom-out-for-mens-300x247.jpg" alt="condom out for mens 300x247 पुरुषों को जल्‍द मिलेगा कंडोम से छुटकारा " width="300" height="247" /></a>आमतौर पर सेक्स के दौरान कंडोम पहनने के तरीके पर कभी कोई पुरूष ग़ौर नहीं करता। कनाडा के शोधकर्ताओं द्वारा बताया गया है कि लगभग 94 फीसदी से अधिक पुरूष कंडोम पहनते हुए ग़लती करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">शोधकर्ताओं ने कंडोम के प्रयोग के वक़्त पुरूषों द्वारा की जाने वाली पांच मुख्य ग़लतियों को बताया है, जो कि निम्न हैं&#8230;</p>
<h2 style="text-align: justify;"><strong>1. कंडोम के साथ लुब्रिकेंट का प्रयोग नहीं करते पुरूष</strong></h2>
<p style="text-align: justify;"> कंडोम पहनकर सेक्स करने से घर्षण अधिक होता है, जिसके कारण सेक्स का मज़ा आधा हो जाता है। कंडोम के साथ विशेष तरह के लुब्रिकेंट का प्रयोग करने से आप इस आनंद को बरकरार रख सकते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार 63 प्रतिशत से अधिक पुरूष कंडोम के साथ लुब्रिकेंट का इस्तेमाल नहीं करते हैं और जो करते हैं वो भी काफी घटिया क्वालिटी के लुब्रिकेंट का इस्तेमाल करते हैं।</p>
<h2 style="text-align: justify;"> 2. कंडोम में हवा न रहे</h2>
<p style="text-align: justify;">अगर कंडोम पहनने के बाद उसके सिरे पर हल्का उभार जैसा दिखाई दे, तो समझ जाइये कि आपके कंडोम में हवा है। कंडोम में हवा रह जाने से लेटेक्स पर अधिक दबाव पड़ता है और संभोग के दौरान कंडोम के फटने की आशंका रहती है। शोधकर्ताओं के अनुसार 37 प्रतिशत पुरूष कंडोम पहनते वक़्त उसमें से हवा बाहर नहीं निकालते हैं।</p>
<h2 style="text-align: justify;"> 3. कंडोम पहनकर असहज महसूस होता है</h2>
<p style="text-align: justify;"> अधिकांश लोगों की ये शिकायत होती है कि कंडोम पहनकर सेक्स करने में उन्हें काफी असहज महसूस होता है (हालांकि अच्छे से अच्छे कंडोम के प्रयोग के बावजूद पुरूष इसे असहज माध्यम बताते हैं) । इसके लिए पुरूष कंडोम के भीतरी और बाहरी सिरे पर अच्छी क्वालिटी का लुब्रिकेंट जेल लगा सकते हैं, जिससे संभोग के दौरान कंडोम आसानी से आपने शिश्न पर मूवमेंट कर सकेगा और आपके आनंद में रूकावट भी नहीं आएगी।</p>
<h2 style="text-align: justify;"> 4. कंडोम पहनने से पहले सही तरीके से चैक करें</h2>
<p style="text-align: justify;"> अधिकांश पुरूष सेक्स की उत्सुकता के कारण यह चैक नहीं करते हैं कि कहीं कंडोम क्षतिग्रस्त तो नहीं। किसी भी तरह की समस्या से बचने के लिए कंडोम पहनने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि कंडोम फटा हुआ न हो।</p>
<h2 style="text-align: justify;">5. कंडोम पहनने में देर न करें</h2>
<p style="text-align: justify;"> कई पुरूष सेक्स के शुरूआती क्षणों में कंडोम नहीं पहनते और स्खलित होने से कुछ देर पहले इसे</p>
]]></content:encoded>
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		<title>जहाँ लड़कियों के गुप्तांगो के साथ किया जाता है खिलवाड ! खतना &#8211; अमानवीय कृत्य  !</title>
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		<pubDate>Tue, 31 Jan 2012 14:54:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kanishka kashyap</dc:creator>
				<category><![CDATA[चाबुक]]></category>
		<category><![CDATA[नारी विमर्श]]></category>
		<category><![CDATA[विचारमीमांसा विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[Female circumcision]]></category>
		<category><![CDATA[female genital mutilation (FGM)]]></category>
		<category><![CDATA[कौन करता है यह खतना]]></category>
		<category><![CDATA[क्या है यह खतना]]></category>
		<category><![CDATA[तस्लीम- खतना के खिलाफ]]></category>
		<category><![CDATA[दावूदी बोहरा मुस्लिम समाज]]></category>

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		<description><![CDATA[रिवाज और प्रथाओं के नाम पर अमानवीयता तो आये दिन सामने आती ही रहती है. परन्तु यह करतूत आपको हैरत में डाल देगी. &#8221; खतना &#8221; नाम की यह प्रथा अत्यंत क्रूर और अमानवीय ही नहीं वरन उस समाज और ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">रिवाज और प्रथाओं के नाम पर अमानवीयता तो आये दिन सामने आती ही रहती है. परन्तु यह करतूत आपको हैरत में डाल देगी. &#8221; खतना &#8221; नाम की यह प्रथा अत्यंत क्रूर और अमानवीय ही नहीं वरन उस समाज और देश के कानून और संविधान की भी खिल्ली उडाता नज़र आता है. महज पांच  से -आठ वर्ष की छोटी बच्चिओं के गुप्तांगो की सुन्नत की यह प्रथा  बोहरा मुस्लिम समुदाय के औरतों के लिये अभिशाप बन चूकी हैं. बोहरा मुस्लिम  समुदाय में जारी इस क्रूर प्रथा के खिलाफ कई अन्तराष्ट्रीय संगठनो के अलावा डॉक्टर्स, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO ) भी अपनी कयवाद में जुटा है.</p>
<h2 style="text-align: justify;"><strong>क्या है यह खतना ?</strong></h2>
<div id="attachment_4997" class="wp-caption alignright" style="width: 560px"><a href="http://www.vicharmimansa.com/2012/01/%e0%a4%9c%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%b2%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%82/bleeding-genitals-of-a-bohra-girl-child/" rel="attachment wp-att-4997"><img class="size-full wp-image-4997" title="bleeding genitals of a bohra girl child" src="http://www.vicharmimansa.com/wp-content/uploads/2012/01/bleeding-genitals-of-a-bohra-girl-child.jpg" alt="bleeding genitals of a bohra girl child जहाँ लड़कियों के गुप्तांगो के साथ किया जाता है खिलवाड ! खतना   अमानवीय कृत्य  ! " width="550" height="397" /></a><p class="wp-caption-text">A Muslim girl suffering khatna ritual</p></div>
<p style="text-align: justify;"><strong>दावूदी बोहरा मुस्लिम समाज</strong> में छोटी बच्चिओं के गुप्तांगों के  <em>भग्न</em>-शिश्न (क्लिटोरिस) को अमानवीय तरीके से बिना किसी एनेस्थिसिया (बेहोस करने की दवा ) के काट कर हटा दिया जाता है. इसे हटाने के लिये साधारण ब्लेड अथवा विशेष प्रकार के चाकू को प्रयोग में लाया जाता है. भग्न-शिश्न के कटते ही , भारी मात्र में खून का रिसाव होने लगता है. ज्ञात हो कि क्लिटोरिस सेक्स प्रक्रिया में उत्तेजित होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.  क्लिटोरिस जो रक्त बहाव के नस का आखिरी सिरा होता है , के कट जाने से लड़किया चरमोत्कर्ष के लिये कठिनाई महसूस करती हैं. इसके कट जाने से औरत के सेक्स प्रकृति में गिरावट आ जाती है.  भग्न-शिश्न को काटने के बाद, हो रहे खून के रिसाव को रोकने के लिये स्थानीय दवा , जिसे &#8220;अबीर&#8221; कहा जाता है , का इस्तेमाल किया जाता है. यह ठंढ पहुचाकर रक्त-रिसाव को रोकने में मदद करता है. <strong> Female circumcision, now widely referred to as female genital mutilation (FGM)</strong></p>
<h2 style="text-align: justify;"><strong>कौन करता  है यह खतना ?</strong></h2>
<p style="text-align: justify;">खतना की प्रक्रिया चुनिन्दा बुजुर्ग मुस्लिम महिलाओं द्वारा बिना किसी विशेष उपकरण और डाक्टरी मदद के की जाती  है. साधारण रेज़र की सहायता से लड़किओं के भग्न-शिश्न को काट कर अलग कर दिया जाता है. इस प्रथा को लेकर  मुस्लिम समाज में निषेधात्मक चुप्पी को लेकर पुरे प्रक्रिया को लेकर ज्यादा जानकारी सामने नहीं आ पाई है.</p>
<p style="text-align: justify;">हालाँकि मुस्लिम समुदाय में  &#8221;सुन्नत &#8221; (लड़कों के लिंग के उपरी चमड़े को काट कर अलग करने की प्रथा ) आम बात है , और इसे पुरे सामाजिक -भागीदारी के साथ मनाया जाता है. परन्तु खतना  एक सीमित मुस्लिम समुदाय द्वारा ही अपनाया जाता है.</p>
<h2 style="text-align: justify;"><strong>कौन है यह लोग -बोहरा मुस्लिम- जो करते हैं यह अमानवीय कृत्य  ?</strong></h2>
<p style="text-align: justify;">बोहरा मुस्लिम समुदाय की भारत में सीमित ही पाया जाता है. दावूदी बोहरा मुस्लिम समुदाय शिया मुसलमान होते हैं. इनकी उत्पति EGYPT और उसके आस-पास का क्षेत्र बताया जाता है. भारत में यह महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में पाए जाते हैं. इनकी कुल आबादी लगभग १० लाख है. इनमे से अधिकांस बड़े व्यापारी और शिक्षित होते हैं.  पूरा बोहरा समुदाय सयेदना (  Syedna) के अधीन हो कार्य करता है. जो कोई  Syedna के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिमाकत करता है उसे समुदाय से बहार निकाल दिया जाता है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">क्या कुरआन देता है इस बात की आज़ादी ?</h2>
<p style="text-align: justify;">जानकारों का मानना है कि कुअरान में इस प्रकार के प्रथा का कोई ज़िक्र नहीं है. परन्तु इसे धर्म और समुदाय को विशिष्ट बनाने के लिये उक्त समुदाय में स्वीकार किया जा चुका है. हालाँकि बोहरा समुदाय की औरतों का विरोध खुल कर सामने आ रहा है. ऐसे में सवाल प्रसाशन और कानून व्यवस्था पर भी खड़े होते हैं. क्या धर्म के नाम पर कानून की खिल्ली ऐसा ही उड़ाई जाती रहेगी ?</p>
<p style="text-align: justify;"><strong><div class="simplePullQuote"></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>बात 53 वर्ष पहले की है , जब जैनब बानो को खतना से गुजरना पड़ा.  प्रोफ. जैनब बानो, जो उदयपुर विश्वविश्यालय की सेवा-निवृत प्रोफेसर है, उस दिन को याद कर सिहर उठती हैं. &#8221; इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती , मैंने एक औरत को अपने अंडरगारमेंट्स को उतारते हुए पाया.  वह मेरे अंडरगारमेंट को खोल रही थी. मुझे यह अंदेशा नहीं था कि मेरे साथ क्या होने वाला है. मुझे बहुत दर्द हुआ और मैं रो पड़ी.  मेरे योनी से खून रिस रहा था और घाव खुला पड़ा था &#8220;. </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>भारत में अधिकांस बोहरा लड़कियां आज भी इस दर्द से गुजरती  हैं. बानो के साथ जो भी हुआ उसकी चर्चा घर में फिर नहीं हुई. &#8220;जब भी मैं अपने माँ से पूछती तो वह कहती कि कुछ नहीं हुआ , यह सभी के साथ होता है और बात को ताल देती थी. &#8220;</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong></div><br />
</strong></p>
<h2 style="text-align: justify;">तस्लीम ने उठाई है आवाज़ , इस अमानवीय प्रथा के खिलाफ ?</h2>
<p style="text-align: justify;">मुंबई की रहने वाली तस्लीम ( जो अपना सरनेम बताने को तैयार नहीं है ) ने इस कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठायी है. तमाम सामाजिक विरोधों के बावजूद तस्लीम ने इस शर्मनाक प्रथा को जब्त मुस्लिम समाज से बाहर लाकर सामाजिक न्याय की कसौटी पर ललकारा है .  उन्होंने बोहरा समाज के  मान्य  मौलाना मोहम्मद बुन्हारुद्दीन के सुपुर्द करने हेतु एक ऑनलाइन पेटिशन दाखिल करने का मंच बनाया है. यह पेटिशन मौलाना को सौंप कर इस कुप्रथा को खत्म करने की गुहार करेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">ऑनलाइन पेटिशन के लिंक देखने के लिये<strong> क्लिक करें :- <strong><a href="http://www.change.org/petitions/hh-dr-syedna-ban-female-circumcision-ladkiyon-par-khatna" target="_blank">क्लिक करें</a></strong></strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong></strong>द्वारा इस मुद्दे को गंभीरता से लेने के बाद कई दैनिक अखबारों और अन्तराष्ट्रीय मीडिया में इस बात की चर्चा जोर पकड़ रही है, कि आखिर किस सभ्य समाज में इस अमानवीय कृत्य को जगह दी जा सकती है. सुन्नत को एक तरह से स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर अगर जायज मान भी लिया जाये , तो खतना को किसी भी आधार पर आधुनिक समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता.</p>
<p style="text-align: justify;">तस्लीम, हालाँकि इस मुआमले में किस्मत वाली थी कि उनके माँ -पिता नें उन्हें इस अत्याचार से बचाये रखा. आज काफी कम बोहरा ने इस पेटिशन पर साइन किये हैं. परन्तु यह मुहीम जोर पकडती नज़र आ रही है.  ज्यादार लोग या तो गैर-बोहरा मुस्लिम समाज से हैं या हिंदू हैं. यह एक बड़ी चुनौती है . क्योंकि बोहरा समाज की पढ़ी लिखी महिलियें भी इस प्रथा के विरोध में नहीं दिखतीं.भले ही एक लड़की को पढ़ने के लिये दुबई के एक अंतराष्ट्रीय स्कूल में  भेजा गया है , पर उसे बॉम्बे बुलाकर <strong>खतना </strong>करा दिया जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">असगर अली , जो पेशे से इंजीनियर है, का कहना है &#8211; खतना का इस्लाम से कुछ लेना-देना नहीं है. कुरान भी इसका ज़िक्र नहीं करता है.  हालाँकि हदीथ में इसका जिक्र है , जिसका पीछे लड़किओं के काम-इच्छा को शिथिल कर उनपर लगाम रखने के लिहाज़ से जरूरी माना गया है.  हालाँकि यह भी विवाद का विषय है.</p>
<h2 style="text-align: justify;"><strong>बोहरा समाज क्यूँ करता है खतना  ?</strong></h2>
<p style="text-align: justify;">किसी भी समाज और धर्म में लिखे गए धर्म-ग्रन्थ अथवा नियमवली काल -स्थान -और समय विशेष में आवश्यक और सत्य होती है . परन्तु कालांतर में उसे धर्म और आचरण से जोड़कर कुरीति बना दिया जाता है. बोहरा समाज एक व्यापारी समाज होता है. प्राचीन समय में बोहरा मर्द , व्यापर के उद्देश्य से दूरस्थ क्षेत्रों में लंबे समय के लिये जाया करते थे. ऐसे में औरतों के काम-इच्छा को शांत रखने के लिये खतना की प्रक्रिया अपनाई गयी . ताकि लंबे समय मर्द के संसर्ग में नहीं आने पर भी लड़किया अपने को नियंत्रित रख सकें . परन्तु आज यह प्रथा बेवजह धर्म की आड़ में लाखों औरतों के मानवीय अधिकारों का हनन कर रही है. यह न सिफ इस्लाम के खिलाफ है , वरन इस प्रथा के भारी दुष्परिणाम भी सामने हैं.</p>
<h2 style="text-align: justify;">लड़किया नहीं पहुँच पाती चरमोत्कर्ष तक , अधूरी रह जाती और काम-इच्छा !</h2>
<p style="text-align: justify;">यह लड़किओं के औरत होने के अधिकार के खिलाफ है . न तो वह सेक्स आ सुख ले सकती हैं और न ही उनकी काम-तृप्ति हो पाती है. इसके अलावा खतना के दौरान किसी भी तरह की अनहोनी से इनकार नहीं किया जा सकता.</p>
<h2 style="text-align: justify;">ऐसे में सवाल उठता है , कि क्या मुस्लिम समुदाय अपने ही कौम की एक बिरादरी में हो रहे इस अत्याचार के खिलाफ  आवाज उठाने की साहस कर सकता है ? क्या भारत जैसे देश में , किसी समुदाय विशेष को धर्म की आड़ में अबोध बच्चों के साथ ऐसा अमानवीय कृत्या करना जायज है ? क्या सरकार और संविधान किसी पशु-संस्कृति के सामने लाचार है?</h2>
<h2 style="text-align: justify;">भारत सरकार को तुरंत इस प्रथा पर रोक लगते हुए , इसे गैर-कानूनी घोषित कर देना चाहिए. साथ ही इस व्यवस्था को बढ़ावा और प्रश्रय देने वाले मुस्लिम आकाओं के खिलाफ कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए.</h2>
<h2 style="text-align: justify;">आप भी इस ऑनलाइन पेटिशन को भर कर अपनी आवाज इस प्रथा के खिलाफ उठा सकते हैं . पेटिशन पर जाने के  <a href="http://www.change.org/petitions/hh-dr-syedna-ban-female-circumcision-ladkiyon-par-khatna" target="_blank">लिये क्लिक करें </a></h2>
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		<title>आरक्षण के इस खेल में कितना और गिरेंगे</title>
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		<pubDate>Mon, 30 Jan 2012 16:07:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>NEWS SOURCE</dc:creator>
				<category><![CDATA[नजरिया]]></category>
		<category><![CDATA[विचारमीमांसा विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[Dr. Shahsi Tiwari]]></category>
		<category><![CDATA[reservation issue in India]]></category>
		<category><![CDATA[आरक्षण]]></category>

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		<description><![CDATA[पांचों राज्यों के चुनाव की मण्डी सज चुकी है सभी अपने माल को बढ़िया व दूसरे के माल को घटिया बता बोली लगा। खरीद-फरोख्त में मशगूल हो गए है। चुनाव की मण्डी का दृश्य किसी पशु मेले की याद को ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><img class="size-full wp-image-4987 alignright" title="anti_reservation_protest" src="http://www.vicharmimansa.com/wp-content/uploads/2012/01/anti_reservation_protest_3.jpg" alt="anti reservation protest 3 आरक्षण के इस खेल में कितना और गिरेंगे " width="330" height="412" />पांचों राज्यों के चुनाव की मण्डी सज चुकी है सभी अपने माल को बढ़िया व दूसरे के माल को घटिया बता बोली लगा। खरीद-फरोख्त में मशगूल हो गए है। चुनाव की मण्डी का दृश्य किसी पशु मेले की याद को ताजा कर देते है जिसमें गधे-घोड़े, बकरे, गाय, भैंस जो सीधे व मरखोर देखने को मिलते है, का बाजार सजा रहता है। मण्डी में ऊँची बोली और आकर्षण का केन्द्र भी मरखोर जानवर ही होते है। कमोवेश लोकतंत्र के पावन उत्सव में भी कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिल रही है जिसमें ब्रांडेड पार्टियां भी नीतिगत्, विधिपूर्ण बातें कम अनगिनत, संविधान विरूद्ध बातों को जनता में झूठे वायदे कर बरगलाने के खेल में कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने को उन्नीस नहीं रखना चाहती। संविधान विरूद्ध बातों जैसे जातिगत आधार पर आरक्षण की बात जिम्मेदार पार्टियों या प्रतिनिधियों द्वारा जनता से करना, कहना कि यदि हम जीते तो 9 प्रतिशत आरक्षण देंगे, यदि हम जीते तो 18 प्रतिशत आरक्षण देंगे आदि-आदि। ऐसा कह वह कही न कही संविधन को ही क्षति पहुंचाने की बात करते है। आश्चर्य तब होता है जब कांग्रेस ऐसी बात करती है। इस संबंध में पंडित जवाहर लाल नेहरू के विचार निःसंदेह उच्च थे। ’’26 मई 1949 को संविधान सभा में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि आप अल्पसंख्यकों को ढाल देना चाहते हैं तो वास्तव में आप उन्हें अलग-थलग करते है, हो सकता है कि आप उनकी रक्षा कर रहे हो पर किस कीमत पर ? ऐसा आप उन्हें मुख्य धारा से काटने की कीमत पर करेंगे’’ इसी के तीन वर्ष बाद 21 जून 1961 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मजहब के आधार पर आरक्षण देने से रोकने के लिए हर राज्य सरकारों को पत्र भी लिखा था। ‘‘मैं किसी भी तरह के आरक्षण को नापसंद करता हूं, यदि हम मजहब या जाति आधारित आरक्षण की व्यवस्था करते है तो हम सक्षम और प्रतिभावान लोगों से वंचित हो दूसरे या तीसरे दर्जे के रहे जायेंगे। जिस क्षण हम दूसरे दर्जे को प्रोत्साहन देंगे हम चूक जायेंगे। यह न केवल मूर्खतापूर्ण है बल्कि विपदा को भी आमंत्रण देना है।’’ मुसलमानों में निचली जातियों में व्याप्त कुरीतियों एंव अशिक्षा को दूर करने के लिए सरकार चरणबद्ध कार्यक्रम चलाना चाहिए। हकीकत में गरीब या पिछड़ा किसी भी जाति का हो सकता है फिर चाहे वह ब्राहृाण, क्षत्रिय, वैश्य ही क्यों न हो। सभी गरीबों के लिए सरकार को एक समुचित दीर्घकालीन कार्यक्रम बनाना ही होगा।’’</p>
<p style="text-align: justify;">क्या हम इतने गए गुजरे हो गए है कि देशहित की सोच न रख केवल हर नई बात, हर नए मुद्दे, हर नई योजना में केवल जाति, धर्म, के आधार पर एक तोते की तरह केवल और केवल आरक्षण की ही बात बड़ी बेशर्मी से करते है। हैरत तो तब और होती है जब कांग्रेस इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीति, सोच एवं विचारों को तिलांजली दे संविधान विरूद्ध आरक्षण की पैरवी करती है। पूर्व न्यायाधीश बी. एन. खरे न्यायपालिका में आरक्षण की उठी मांग का पूर्व में ही विरोध कर चुके है, कह चुके है इससे मेरिट प्रभावित होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">मण्डल आयोग की भी बुद्धि को देखिए 1931 की जनगणना को पिछड़े वर्गों के आरक्षण जिसमें ओ.बी.सी. आबादी 52 प्रतिशत को माना जबकि 40 वर्षों में कितनी इनकी संख्या बढ़ी का कोई अता-पता नहीं बस आरक्षण लागू हो गया। इससे सिद्ध होता है कि हमारे नेता आरक्षण के लिए कितने उतावले है? इस देश का बेड़ागर्क करने में, डुबाने में नेताओं की अहम भूमिका हैं। शायद यह लोकतंत्र का भविष्य में सबसे काला अध्याय साबित हो?</p>
<p style="text-align: justify;">आज आरक्षण के ही कारण हमारे देश की प्रतिभाओं का पलायन विदेशों में हो रहा है इस चिंता को पंडित जवाहरलाल नेहरू 40 वर्ष पहले ही व्यक्त कर चुके है। आज राजनेताओं को हमारे कोटा वाले डॉक्टरों पर शायद भरोसा नहीं है। तभी किसी अच्छे डॉक्टर या संभवतः देश के बाहर ही अपना इलाज कराना पसंद करते है। हकीकत तो यह है आज कोटे वालों को ही कोटे के डॉक्टरों पर उतना यकीन नही है जिनता आवश्यक है। हकीकत में देखा जाए तो नेता ही आज जनता-जनता में जातियों एवं धर्म का जहर घोल, अधिक से अधिक आरक्षण दिलाने का वादा कर देश को विखण्डित करने की दूरगामी रणनीति पर कार्य करते ही नजर आ रहे है।</p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्रीय नमूना 1999-2000 के अनुसार पिछडा वर्ग का आकड़ा 36 प्रतिशत है। मुस्लिम को हटाकर यह आंकड़ा 32 प्रतिशत है अर्थात् 4 प्रतिशत मुस्लिम है। शायद इसीलिए शासन में मुस्लिम समुदाय के पिछड़ों को 4.5 प्रतिशत आरक्षण ओ.बी.सी. में से देने की बात कह रही है। हकीकत में सच्चर ने वास्तविक पिछड़े और जरूरतमंद लोगों की पहचान के लिए कहा कि योग्यता के आधार पर 60 अंक, घरेलू आय पर 13 अंक जिला या कस्बा जहां व्यक्ति ने अध्ययन किया। 13 अंक, पारिवारिक आय और जाति के आधार पर 14 अंक इस प्रकार कुल 100 अंक होते है। वही मलाईदार परत को पहचानने के लिये सिफारिश किये गये मानदंड जिसमें साल में 250000 से ऊपर आय वाले परिवार को मलाईदार परत में शामिल किया जाना चाहिए लेकिन हम इतने निकम्मे हो गए, इतने मुफ्तखोर बनते जा रहे है कि साल भर की आय की सीमा को ही बढ़ा 9 से 12 लाख तक करने की कोशिश में है। आरक्षण में इन्हें कोटे से बाहर रखा गया जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर, अभिनेता, चार्टड अकाउटेंट, सलाहकारों, मीडिया, पेशेवरो लेखकों, नौकरशाहो, कर्नल एवं समकक्ष रेंक या अन्य ऊंचे पदों पर, उच्च न्यायालयो, उच्चतम न्यायालयों के न्यायधीशों, सभी केन्द्र एवं राज्यों के सरकारी ए और बी वर्गों के अधिकारियों के बच्चों को भी इससे बाहर रखा गया है। अदालत ने तो सांसदों एवं विधायकों के बच्चों को भी कोटे से बाहर रखने का अनुरोध किया।</p>
<p style="text-align: justify;">अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका, मलेशिया, ब्राजील सहित अनेक देशों में सकारात्मक योजनाएं काम कर रही है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने हाल ही में हुए शोध के अनुसार सकारात्मक कार्यवाही योजनाएं सुविधाहीन लोगों के लिए लाभप्रद हुई है।</p>
<p style="text-align: justify;">वही भारत में इसके ठीक उलट स्वतंत्रता के पश्चात् हमारे नेताओं ने संकीर्ण राजनीति का निकृष्ट उदाहरण पेश करते हुए आरक्षण को और बढ़ावा ही दिया है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत के केन्द्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद जो जिम्मेदार ओहदा संभाले हुए है ने उत्तर प्रदेश ने फर्रूखावाद से लड़ रही अपनी पत्नी के चुनाव क्षेत्र में मुस्लिम आरक्षण की दिशा में एक कदम बढ़ाते हुए विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के सत्ता में आने पर मुसलमानों को पिछड़े वर्ग के कोटे में से 9 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा, कह निःसंदेह पूरी कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करने के साथ-साथ मंत्री पद के दौरान् ली गई शपथ का घोर उल्लंघन कर चुनाव आचार संहिता का भी मजाक उड़ाया है, यह अक्षम्य है। हालांकि चुनाव आयोग ने उन्हें इस कृत्य के लिए एक कारण बताओ नोटिस भी तलब किया है जिसे मिल उनके अंदर उनका अहम और जाग उठा कह रहे है नोटिस ही तो हे कोई फाँसी की सजा तो नहीं?</p>
<p style="text-align: justify;">पूर्व मुख्यमंत्री एवं सांसद मुलायम सिंह मुसलमानों को 18 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कह रहे है। मेरा कहना है कि 18 प्रतिशत ही क्यों और क्यों नहीं? ऐसा लगता है कि हमारे माननीय, संविधान को अपने घर का कानून समझते हैं? हमें यह नहीं भूलना चाहिए राष्ट्र सर्वोपरि है, संविधान सर्वोपरि है इसके विरूद्ध कुछ भी कहने वाला व्यक्ति संविधान की नजर में केवल एक बदनुमा दाग ही हो सकता है और इससे ज्यादा कुछ नहीं।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>डॉ.शशि तिवारी</strong></p>
<p style="text-align: justify;">(लेखिका ‘‘सूचना मंत्र’’ पत्रिका की संपादक हैं)<br />
मो. 09425677352</p>
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		<title>छदम लोकतंत्र बनाम गुण्डातंत्र</title>
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		<pubDate>Wed, 07 Dec 2011 22:41:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kanishka kashyap</dc:creator>
				<category><![CDATA[चौपट राजा]]></category>
		<category><![CDATA[मीडिया मीमांसा]]></category>
		<category><![CDATA[विचारमीमांसा विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[विशेष खबर]]></category>
		<category><![CDATA[छद्म लोकतंत्र]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय लोकतंत्र]]></category>
		<category><![CDATA[लोकतंत्र]]></category>

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		<description><![CDATA[लोकतंत्र का, संविधान का, नियमों का जितना दुरूपयोग जनप्रतिनिधि होने के नाम पर जनप्रतिनिधियों ने किया है शायद ही किसी अन्य ने इतिहास में किया हो। फिर बात चाहे सारे राह तिरंगा जलाने की हो, जनभावना को उकसाने की हो, ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.vicharmimansa.com/wp-content/uploads/2011/12/Loktantra..votetantra...1.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-4916" title="Loktantra..votetantra...1" src="http://www.vicharmimansa.com/wp-content/uploads/2011/12/Loktantra..votetantra...1.jpg" alt="Loktantra..votetantra...1 छदम लोकतंत्र बनाम गुण्डातंत्र"  /></a>लोकतंत्र का, संविधान का, नियमों का जितना दुरूपयोग जनप्रतिनिधि होने के नाम पर जनप्रतिनिधियों ने किया है शायद ही किसी अन्य ने इतिहास में किया हो। फिर बात चाहे सारे राह तिरंगा जलाने की हो, जनभावना को उकसाने की हो, अपनी अभिलाषा के लिए जनता को भीड़तंत्र में बदल मरवाने की हो, भीड़तंत्र के सहारे शासकीय एवं अशासकीय सम्पत्ति को नुकसान पहुचाने की हो, अपने अनुयाईयों को भड़का किसी पर हमला करने की हो, संसद-विधानसभाओं में अध्यक्षों के साथ-साथ जनप्रतिनिधियों की लडाई किसी गेंगवार की तरह हो? सुप्रीम कोर्ट कोई आदेशों की दुहाई देने वाले उसकी ही बातों पर प्रश्न चिन्ह लगाने की हो? घपले घोटालों, भ्रष्टाचार के माध्यम से अकूत सम्पत्ति अर्जित करने की हो, स्वयं अपनी पगार बढ़ाने की हो? अधिकांश मामलों में जनप्रतिनिधि अपने को नियमों से अपने को ऊपर या परे से समझते नजर आते रहे है। ये बराबरी तो आई. ए. एस. के वेतनों से करेंगे लेकिन किसी शासकीय अधिकारी/कर्मचारियों की तरह नियमों के बंधन से छिटकते ही नजर आयेंगे क्या ये बेईमानी नहीं हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">जनता के पैसों पर जनसेवा के नाम पर खुद का रातों-रात धन कुबेर बना लेना, जनता के माल पर डाका नहीं? निरीह जनता की दम पर सत्ता की मलाई खाने वाले अपने को जनता से अलग समझने की ठसक और अभिमान में चूर हो जनता की पीड़ा को अनदेखा करना, अनसुनी करना, रातों रात बने धन कुबेर द्वारा अर्जित सम्पत्ति का óोत न बताना कहां तक उचित है? यदि वास्तव में लोकतंत्र में जनता मालिक, जनप्रतिनिधि सेवक है तो जनता की प्रतिक्रिया या उसकी आवाज को डॉन की तरह भूमिका अदा कर आवाज दबाने से क्या लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ता?</p>
<p style="text-align: justify;">विगत् दो वर्षों में क्या केन्द्र सरकार, क्या राज्यों की सरकार घपले-घोटालों, भ्रष्टाचार, अत्याचार, अनाचार, कुपोषण, बेरोजगारी महंगाई को सुनामी के थपेड़ों से बुरी तरह लड़खड़ा रही है। ऐसी त्रासदी में भी तथाकथित नेता जनता की समस्याओं की और न देख अपनी राजनीति चमकाने में व्यस्त है। सब कुछ ऐसा लगता है कि किसी के घर में गमी हुई हो और पड़ोसी डिस्को गाने बजाये और गाए और लोगों के विरोध करने पर या हमला होने पर अपनी अभिव्यक्ति का संवैधानिक हनन होने की बात करें। आज एसा ही कुछ कृत हमारे माननीय कर रहे है यहां यक्ष प्रश्न स्वतः उठ खड़े होते है मसलन जनप्रतिनिधि/मंत्री किसके लिए है? जनता या उद्योगपति के लिए? महंगाई पर अगर नियंत्रण नहीं पा सकते या लाचार है तो कम से कम ऊल-जुलुल भविष्यवाणी कर जनता के घावों को तो न कुरेदों, चौतरफा महंगाई की जली जनता के ऊपर नमक तो मत छिड़को? यदि महंगाई पर काबू नहीं होता हो तो इसे अपनी अक्षमता समझ इस्तीफा दे जनता की आवाज क्यों नहीं बनते? मंत्री जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठ गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी करना आज एक टेªण्ड सा बन गया है। ये तो भारतीय जनता है कई वर्षों तक गुलाम रही है, काफी सहनशील है, जल्द क्रांति घटित नहीं होती। हकीकत में आज भी भारत का नागरिक गुलाम ही है। मेरी इस बात को पढ़ चौकिये मत हाँ ये सही है। अन्तर सिर्फ इतना है इतिहास से आज तक सिर्फ शासन बदला, जनता आज भी उतनी ही गुलाम और शोषित है जितनी पहले थी। आज तथाकथित नेताओं ने केवल युवाओं की गुलाम फौज ही तैयार करी है जो सिर्फ ‘‘हुक्म मेरे आका’’ का ही न केवल इंतजार करती है बल्कि मर कटने, काटने को भी तैयार रहती है। यदि गलती से इन्हीं युवाओं में कोई स्वाभिमानी निकल गया तो ये आका उसे सीखचों के पीछे पहुंचाने और मरवाने में भी देरी नहीं करते। आखिर गुलाम, गुलाम ही रहता है उसकी अपनी कोई मर्जी हो भी नहीं सकती।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रणव मुखर्जी कितने भोलेपन से कहते है कि ‘‘आखिर में देश किधर जा रहा है’’ पेड़ बबूल का वो आखिर आम की इच्छा करना ही बेमानी है। गलत हमेशा गलत रहेगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कृत्य करने वाला छोटा है, बड़ा है या प्रभावी है। हाल ही में एक युवक द्वारा माननीय मंत्र.ी शरद को चांटा मारना किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता। हमारे संविधान में कोई भी व्यक्ति नियम से ऊपर नहीं है चाहे वो छोआ हो या बड़ा हो या मंत्री हो? गलती जो भी करेगा यदि उसे हम संविधान के अनुसार, नियमों के अनुसार दण्ड दे तो ऐसी नौबत ही नहीं आयेगी, दिक्कत तब आती है ‘‘बड़े करे सो क्षम्य है, छोटे करे सो दण्ड’’ भेदभाव की नीति हमेशा विद्रोहियों को ही जन्म देगी जिसे रोकना भी मुश्किल है?</p>
<p style="text-align: justify;">मंत्री, जनप्रतिनिधि और जनता को संविधान की रक्षा के लिए अपनी-अपनी जवाबदेही, कर्त्तव्यनिष्ठा का पालन, स्वस्थ लोकतंत्र के लिए करना ही चाहिए। कहते भी है बुराई का प्रवाह ऊपर सेे नीचे की ओर होता है। ऊपर वाले सुधरेंगे तो नीचे वाले अपने आप ही सुधर जायेंगे। अन्त में हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">(लेखिका ‘‘सूचना मंत्र’’ पत्रिका की संपादक हैं)</p>
<p style="text-align: justify;">मो. 9425677352</p>
<p style="text-align: justify;">(शशि फीचर)</p>
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		<title>क्रान्तिधर्मी चेतना का शायर: फैज</title>
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		<pubDate>Tue, 25 Oct 2011 13:33:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>loksangharsha</dc:creator>
				<category><![CDATA[समाज]]></category>

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		<description><![CDATA[हमारा इस बात में दृढ़ विश्वास है कि साहित्य बहुत गहराई से मानवीय नियति के साथ जुड़ा है। स्वतत्रंता और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता के बिना साहित्य का विकास संभव नहीं है, उपनिवेशवाद और नस्लवाद का समूल नाश साहित्य की सृजनात्मकता के ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3><a href="http://loksangharsha.blogspot.com/2011/10/blog-post_25.html"><br />
</a></h3>
<p>हमारा इस बात में दृढ़  विश्वास है कि साहित्य बहुत गहराई से मानवीय नियति के साथ जुड़ा है।  स्वतत्रंता और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता के बिना साहित्य का विकास संभव नहीं  है, उपनिवेशवाद और नस्लवाद का समूल नाश साहित्य की सृजनात्मकता के संपूर्ण  विकास के लिए बेहद जरूरी है।<br />
उपर्युक्त विचार क्रान्तिधर्मी चेतना  के शायर फै़ज अहमद ‘फ़ैज’ के हैं। यह विचार उन्होंने सन् 1983 में ताशकन्द  में आयोजित एफ्रो एशियाई लेखक संघ की रजत जयन्ती के अवसर पर व्यक्त किए थे,  जो उनके व्यक्तित्व और तदनुरूप कृतित्व पर ज्यों का त्यों चस्पा की जा  सकती है क्योंकि उनके जीवन और रचना में फाँक बेहद कम है।<br />
सन् 2011  जहाँ हिन्दी साहित्य में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने वाले कतिपय महत्वपूर्ण  लेखकों अज्ञेय, शमशेर, नागार्जन प्रभृत के शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया  जा रहा है वहीं पर हिन्दी-उर्दू जगत में समान रूप से समादृत और लोकप्रिय  शायर फै़ज़ और मज़ाज़ जैसी शख्सियतों को विभिन्न हलकों में शिद्दत के साथ  याद किया जा रहा है।<br />
फिलवक़्त उर्दू-हिन्दी अनुवादक के रूप में  ख्याति प्राप्त विद्वान शकील सिद्दीकी द्वारा संपादित पुस्तक ‘फैज अहमद  ‘फैज’ शख्स और शायर (पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस लि0 नई दिल्ली, मूल्य रू0  80/00) पर कुछ विचार।<br />
यूँ तो फैज के आकर्षक चित्र से युक्त पुस्तक  पढ़ने के क्रम में ज्यों ही पहले पन्ने का साक्षात्कार होता है, ‘हम  मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे। इक खेत नहीं, एक देश नहीं,  सारी दुनियाँ माँगंेगे।’ संपादक का, शायर फैज के प्रति उनका प्रतिबद्ध  प्रगतिशील दृष्टिकोण का ऐलान कहा जा सकता है। जिसे अन्तिम पृष्ठ पर उसे  पूरे का पूरा छापा गया है। बेशक! उनकी शायरी का यह एक रंग और अहम हिस्सा  है। किन्तु फैज सिर्फ इतना ही नहीं और भी कुछ हैं, जो इसमे नहीं है। उनकी  शायरी के वे हिस्से, शेड्स कम महत्वपूर्ण नहीं जिसमें उन्होंने अपने समाज  से पे्रम, मोहब्बत और तमाम वैयक्तिक जज्बातों को शेरों के रूप मंे व्यक्त  किया है, किन्तु यह बात बहस तलब है।<br />
इससे बेहतर बात यह है कि शकील  सिद्दीकी ने अपनी इस संपादित पुस्तक में शायर फैज को उनकी सम्पूर्णता मंे,  पूरी जीवन्तता के साथ उन्हें पकड़ने का सराहनीय प्रयास किया है। जहाँ एक ओर  इस मंे उन्होंने उनकी 38 गजलों, नज्मों, शेर और तरानों को संकलित कर उनकी  शायरी के कमोबेश सभी महत्वपूर्ण पहलुओं से पाठक को उनका परिचय कराने का  प्रयत्न किया है वहीं पर उन्होंने उनके व्याख्यान (जिसका एक हिस्सा ऊपर  उद्धृत है) वक्तव्य, आत्मकथ्य, उनकी पत्नी एलिस फैज तथा उनकी पुत्री सलीका  हाशमी का साक्षात्कार, भीष्म साहनी, शमीम फैजी और यासिर अरफात के लेखों के  जरिए उनके संघर्षशील जुझारू व्यक्तित्व को समझने के साथ उनकी शायरी की  बनावट और बुनावट तथा वैचारिकी को समझने में काफी मददगार साबित हुए हैं। इसे  समझने के लिए लेखक के आत्मकथ्य का देखना जरूरी है।<br />
‘शुरू मंे ख़याल  हुआ हम क्रिकेटर बन जाएँ, फिर जी चाहा उस्ताद बन जाएँ। रिसर्च करने का शौक  था। अन्ततः उस्ताद बनकर अमृतसर चले गए। हमारी जिन्दगी का शायद सबसे  खुशगवार जमाना अमृतसर का ही था। मजदूरों में काम शुरू किया। सिविल लिबर्टीज  की एक अंजुमन बनी तो उसमें काम किया।’<br />
यह कथन यह सिद्ध करता है कि  उनकी आशाओं, आकांक्षाओं के अनुरूप उन्हें जिन्दगी नसीब न हो सकी। इसका मलाल  भी कहीं निश्चय ही उन्हें रहा होगा जो उनकी शायरी के पहले दौर में  अभिव्यक्ति पा सका है। मजदूरों में काम, संघर्ष जद्दोजहद, तरक्की पसंद  संगठनों के साथ उनके नजरिये को अपनाकर उन्होंने समाज और देश की जनता के लिए  अपना जीवन और अपनी शायरी को समर्पित किया था। यही उनकी महानता है। शायद  इसीलिए भीष्म साहनी ने ‘यादे फैज’ में लिखा है कि एक कवि की रचना धर्मिता  और उसी ऊँचाई की उसकी संगठन व संचालन क्षमता उसकी व्यावहारिक बुद्धि का  परिचायक है।<br />
आज के दौर में फैज को आम फहम बनाने में उनके व्यक्तित्व  का यह पहलू भी कम अहम नहीं है। इसके लिए उनके प्रारंभिक उद्धरण पर ध्यान  देना ही पर्याप्त होगा कि उन्होंने उपनिवेशवाद, नस्लवाद और विभिन्न देशों  में बढ़ रहे साम्राज्यवादी दृष्टिकोण का, विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर,  अपनी शायरी के माध्यम से पुरजोर विरोध किया है। कदाचित शकील सिद्दीकी ने  ‘फैज-अवाम के अरमानों सपनों का शायर’ में सच ही कहा है कि फ़ैज़ ने एक साथ  जुल्म व नाइंसाफी के खिलाफ उठ खडे़ होने तथा दर्द के बढ़ते जाने को  शैलीब्रेट तथा उनसे नई ऊर्जा हासिल करने का हौसला दिया है। जिसका परिणाम  उन्हें देश निकाला के रूप में भुगतना पड़ा। वे भारत की शरण में आए, यदि वह  हिस्सा भी पुस्तक का अंग बनता तो पुस्तक भारतीय जन आंकाक्षाओं के अनुरूप  ज्यादा स्वागत योग्य होती। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि शकील सिद्दीकी जैसे  विद्वान ने भी उनके गद्य और संपादन कला के प्रति दूसरों की तरह चुप्पी ही  साधी है। एक रस्म अदायगी भरा काम ही उनका यह कहा जाएगा। अगर इस उपमहाद्वीप  में लोकप्रियता की बात हो तो दावे के साथ यह कहना कठिन है कि वे मिर्जा  गालिब या कुर्रतुल ऐन हैदर के समकक्ष हैं किन्तु इतना निश्चित ही कहा जा  सकता है कि वर्तमान युग में एक बेहद जरूरी समझे जाने वाले शायर हैं।</p>
<p>-महन्त विनय दास<br />
मो0: 9935323168 (समीक्षक)</p>
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		<title>अन्ना हजारे का ट्रेलर : डॉ. शशि तिवारी</title>
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		<pubDate>Tue, 25 Oct 2011 12:22:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>VICHARMIMANSA DESK</dc:creator>
				<category><![CDATA[खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[नजरिया]]></category>
		<category><![CDATA[विचारमीमांसा विशेष]]></category>
		<category><![CDATA[विशेष खबर]]></category>
		<category><![CDATA[अन्ना हजारे]]></category>
		<category><![CDATA[अन्ना हजारे और लोकपाल बिल]]></category>
		<category><![CDATA[बाबा रामदेव]]></category>
		<category><![CDATA[लोकपाल बिल संसद में]]></category>

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		<description><![CDATA[अन्ना हजारे का ट्रेलर : डॉ. शशि तिवारीयहाँ दोनों लघु कहानी कही न कही परोक्ष रूप से कांग्रेस पर फिट बैठती नजर आ रही है और यह कई जगहों पर स्पष्ट दृष्टिगोचर भी हुआ है। फिर बात चाहे बाबा रामदेव ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.vicharmimansa.com/wp-content/uploads/2011/10/anna-hazare-lokpal-bill1.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-4908" title="anna hazare lokpal bill" src="http://www.vicharmimansa.com/wp-content/uploads/2011/10/anna-hazare-lokpal-bill1.jpg" alt="anna hazare lokpal bill1 अन्ना हजारे का ट्रेलर : डॉ. शशि तिवारी"  /></a>अन्ना हजारे का ट्रेलर : डॉ. शशि तिवारी</strong>यहाँ दोनों लघु कहानी कही न कही परोक्ष रूप से कांग्रेस पर फिट बैठती नजर आ रही है और यह कई जगहों पर स्पष्ट दृष्टिगोचर भी हुआ है। फिर बात चाहे<strong> बाबा रामदेव</strong> के आंदोलन में बर्बरतापूर्वक लाठी भांजने के सिलसिले की हो जिसमें बाद में एक महिला राजबाला की मृत्यु भी हो गई थी। वही ‘‘जनलोकपाल’’ को ले <strong>अन्ना हजारे </strong> का देशव्यापी आंदोलन कांग्रेस की आँखें खोलने के लिये, समझ के लिए काफी था। ये दोनों ही आंदोलन जनभावनाओं की सुनामी का पूर्व संकेत थी। लेकिन पद और अहंकार में मदमस्त कांग्रेस के तथाकथित बयानवीरों ने उल्टा चोर कोतवाल को डाटें की तर्ज पर अन्ना की ही छीछालेदर करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। ये अलग बात है कि अन्ना का तो वो कुछ बिगाड़ नहीं पाए लेकिन, परोक्ष रूप से अपनी ही पार्टी की जरूर दुर्दशा कर बैठे, जो आज तक जारी है। ऐसी स्थिति सामान्यतः तभी उठ खड़ी होती है जब व्यक्ति पार्टी से खुद को बड़ा, खुद से पार्टी को समझने की भूल करने लगता है।</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">यहाँ कुछ यक्ष प्रश्न स्वतः उठ खड़े होते है, अहंकार क्यों और किसके लिए? जब कांग्रेस की नियत मंे खोट ही नही है तो जनलोकपाल में देरी क्यों? केन्द्र में केवल कांग्रेस ही नही साथ में अन्य पार्टियां भी है लेकिन बदनामी का टीका केवल कांग्रेस के ही माथे पर लग रहा है क्यों? क्या पार्टी विनाश का इंतजार कर रही है? अन्य राजनीतिक पार्टियों को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मुद्दा दे खुद की कब्र क्यों खुदवा रही है?</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा सब कुछ हाल ही में 13 अक्टूबर को हिसार (हरियाणा) में हुए मतदान को लेकर आने वाले संकेतों से अब तो कांग्रेस को सबक लेना ही होगा? इस चुनाव में <strong>अन्ना हजारे</strong> टीम ने खुलकर कांग्रेस की खिलाफत की थी जिसके परिणामस्वरूप कुलदीप विश्नोई को अपने पिता भजनलाल के चुनाव 2009 की तुलना में एक लाख से ज्यादा वोट मिले और कांग्रेस के उम्मीदवार जयप्रकाश अपनी जमानत भी नही बचा पाए। क्या वाकई में कांग्रेस की ये शर्मनाक हार क्या जन लोकपाल विधेयक पास न करने का दुष्परिणाम का टेªलर है? क्या यह एक जन लोकपाल के लिए जनमत संग्रह है? क्या हिसार में<strong> <a href="http://www.vicharmimansa.com/?p=4906">अन्ना हजारे</a></strong> की  टीम ने हिसाब करने का जवाब दिया है? हकीकत में यह हाल केवल हिसार का ही नहीं है बल्कि महाराष्ट्र में खड्गवासला में भी खोई सीट का है। ऊपर से हरियाणा में कांग्रेस में चुनाव प्रभारी बी.के. हरिप्रसाद कहते है कि अन्ना का प्रभाव बिलकुल नहीं है, पिछली बार भी जीत की लहर में हम हिसार सीट हारे थे। अब तीसरे स्थान पर है, उन्होंने यह शर्मनाक बयान देते समय यह तनिक भी नहीं सोचा कि जनता को आखिर क्या सन्देश देना चाहते है कि हिसार में कांग्रेस आदतन हारने वाली पार्टी है? वही कांग्रेस के ही वरिष्ठ मंत्री प्रणव मुखर्जी हिसार की</p>
<p style="text-align: justify;">हार को निराशाजनक तो मान रहे है लेकिन साथ में उनके भी अंदर दबी अहंकार की भावना जिसे वे दबा नहीं पाए कि इसमें अन्ना की अपील का कोई भी लेना-देना नहीं है, पार्टी इस पर विचार करेगी?</p>
<p style="text-align: justify;">वही भाजपा के शाहनवाज भी बिना मौका गंवाए इसे केन्द्र के कुशासन और भ्रष्टाचार की नीति के खिलाफ जीत बता रहे है। उधर अन्ना फिर हुंकार भर कह रहे है कि कांग्रेस हिसार की हार से सबक ले और जनलोकपाल बिल को शीतकालीन सत्र में ही पास करवाए नहीं तो मैं आगे आने वाले पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में स्वयं जा कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करूंगा।</p>
<p style="text-align: justify;">यहाँ कांग्रेस के लिए घड़ी रणनीति, कूटनीति वैचारिक संकट की है। ‘‘बीती ताहे विसार दे, आगे की सुधि ले’’ की तर्ज पर मान, अपमान, अभिमान, अहंकार को छोड़ वास्तविक धरातल पर कांग्रेस को सोचना होगा। यदि ईमानदारी से भ्रष्टाचार को कांग्रेस हराना ही चाहती है, अन्य पार्टियों को इस मुद्दे पर राजनीति न करने देना चाहती है तो शीतकालीन सत्र का ही इंतजार क्यों? विशेष सत्र बुला तत्काल जनलोकपाल को और कड़े प्रावधानों के साथ बिना किसी राजनीतिक बिरादरी के नफा नुकसान के शीघ्र पास कराना ही सर्वोच्च प्राथमिकता में होना चाहिए। पार्टी में लुटने, बिखरने, छिन्न-भिन्न होने तक का इंतजार कहां तक उचित होगा? कहते है कि साख बनाने में पूरी उम्र बीत जाती है लेकिन इसे गिराने में एक क्षण, एक पल, एक मिनट ही पर्याप्त होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">यहाँ ‘‘समय’’ की भूमिका इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि अब सभी की निगाहे उत्तर प्रदेश के दंगल पर टिकी है जहाँ युवा तुर्क राहुल गांधी और राजनीति के कुशल कूटनीतिज्ञ चाणक्य दिग्विजय सिंह दोनों का राजनीतिक भविष्य दांव पर लगेगा। आगे लिखा जाने वाला इतिहास कभी भी इन छोटी-छोटी भूलों और पाले गए अहंकारों को कभी माफ नहीं करेगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>डॉ. शशि तिवारी<br />
(लेखिका सूचना मंत्र पत्रिका की संपादक हैं)</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>(शशि फीचर)</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>दीपावली है दीपों का त्यौहार</title>
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		<pubDate>Mon, 24 Oct 2011 07:16:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kanishka kashyap</dc:creator>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>

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		<description><![CDATA[दीपावली  है दीपों का त्यौहार दीपावली, दीपों का त्यौहार , लाता खुशियाँ ढेर अपार , आता साल में एक ही बार , लगता है ये सबको प्यारा, रोशनी से भरता गगन को , बच्चे लड़ी, पटाखे और फूलझड़ी जलाते हुए, मिठाई, मेबे ,खील बताशे ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="text-decoration: underline">दीपावली  है दीपों का त्यौहार</span></p>
<p><span style="text-decoration: underline"> </span></p>
<p>दीपावली, दीपों का त्यौहार ,</p>
<p>लाता खुशियाँ ढेर अपार ,</p>
<p>आता साल में एक ही बार ,</p>
<p>लगता है ये सबको प्यारा,</p>
<p>रोशनी से भरता गगन को ,</p>
<p>बच्चे लड़ी, पटाखे और फूलझड़ी जलाते हुए,</p>
<p>मिठाई, मेबे ,खील बताशे और खाते हुए,</p>
<p>तरह-तरह के व्यंजन बनाती मम्मी,</p>
<p>बच्चे पुरे उत्साह से भरपूर ,</p>
<p>दीवाली धूमधाम से मनाते हुए ,</p>
<p>दुश्मन भी हाथ मिलाते हुए ,</p>
<p>दोस्त गले मिलते हुए ,</p>
<p>नए-नए कपडे पहने बच्चे ,</p>
<p>लक्ष्मी-गणेश पूजा करती मम्मी,</p>
<p>गिफ्ट बाटते आस-पडोसी ,</p>
<p>दीपावली खुशियों का  त्यौहार ,</p>
<p>यही तो है मेरा सबसे प्रिय त्यौहार</p>
<p>ज्योति चौहान</p>
<p>सेक्टर-२२, नॉएडा</p>
<p><strong> </strong><strong><a href="mailto:jyotipatent@gmail.com">jyotipatent@gmail.com</a></strong></p>
]]></content:encoded>
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		<title>प्रशांत भूषण के साथ दुर्व्यवहार निंदनीय</title>
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		<pubDate>Wed, 12 Oct 2011 21:10:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kanishka kashyap</dc:creator>
				<category><![CDATA[कनिष्क की बक-बक]]></category>
		<category><![CDATA[खबरें]]></category>
		<category><![CDATA[देश- दुनिया]]></category>
		<category><![CDATA[विशेष खबर]]></category>
		<category><![CDATA[अन्ना हजारे]]></category>
		<category><![CDATA[प्रशांत भूषण]]></category>
		<category><![CDATA[प्रशांत भूषण पर हमला]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीराम सेना]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीराम सेना प्रशांत भूषण]]></category>

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		<description><![CDATA[अन्ना हजारे के सहयोगी और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण पर किया गया हमला घोर निंदनीय है. लेकिन जिन  युवाओं ने उन पर हमला करने का जिम्मा लिया है, नहे कथित तौर पर श्रीराम सेना का बताया जा रहा है. हालाँकि एक ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.vicharmimansa.com/wp-content/uploads/2011/10/prashant-bhushan-attcked.jpg"><img class="alignright size-full wp-image-4867" title="prashant bhushan attcked" src="http://www.vicharmimansa.com/wp-content/uploads/2011/10/prashant-bhushan-attcked.jpg" alt="prashant bhushan attcked प्रशांत भूषण के साथ दुर्व्यवहार निंदनीय" width="350" height="225" /></a>अन्ना हजारे के सहयोगी और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण </strong>पर किया गया हमला घोर निंदनीय है. लेकिन जिन  युवाओं ने उन पर हमला करने का जिम्मा लिया है, नहे कथित तौर पर <strong>श्रीराम सेना</strong> का बताया जा रहा है. हालाँकि एक और संगठन भगत सिंह क्रांति संगठन ने फेसबुक पर इसकी जिम्मेदारी ली है. खुद को पुलिस के हवाले किये सख्स ने स्वयं को श्रीराम सेना का प्रदेश अध्यक्ष भी बताया है. हालाँकि तेजिंदर पाल सिंह , को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता भी हूँ और लगातार संपर्क में भी रहते हैं. प्रशांत जी पर हमले के वीडियो फूटेज को देख कर वास्तव में पीड़ा हुई. एक पितृतुल्य व्यक्ति को बेरहमी और बड़ी बुरी तरह लात-जूतों से मारता हुआ युवक, पहली दृष्टि में एक नकारात्मक छवि ही दे रहा था. मीडिया में आ रहे बयानों से इतर मैंने व्यक्तिगत रूप से मामले की सच्चाई जानना चाहा. इस सम्बन्ध में मित्रों से लंबी वार्ता भी हुई.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://www.youtube.com/watch?v=qQnV8zwa5xs"><strong>कश्मीर की आड़ में प्रशांत भूषण की कर दी पिटाई, सबने की निंदा- वीडियो </strong></a></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><a href="http://www.youtube.com/watch?v=qQnV8zwa5xs"></a>पाठकों को ज्ञात हो कि कुछ इस तरह का ही व्यक्तिगत हमला मैंने १३ फरवरी २००९ में अरुंधती राय पर भी किया था. तब मैंने अरुंधती को जूते  से नवाजा था. कुछ ऐसी ही मिली जुली प्रतिक्रिया व्यक्त हुई. हालाँकि वाशिंगटन पोस्ट , न्यूयार्क टाइम्स , भारतीय अखबारों के आलावा पाकिस्तानी मीडिया में भी इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था. </strong></p>
<p style="text-align: justify;">इस पूरे घटनाक्रम पर एक समीक्षात्मक दृष्टि डालें तो दो बातें स्पष्ट होती है. पहला कि नैतिक आधार पर यह व्यवहार गलत है.<strong> प्रशांत भूषण</strong> द्वारा कश्मीर मुद्दे पर दिया गया बयान , एक स्पष्ट बयान है जो शायद एक पंक्ति ज्यादा बोलने से कुछ कड़वा लगता है. कश्मीर को किसी भी शर्त पर विवादित कहना , समस्या कहना या अलग पहचान देने की बात कहना आज के समय में कूटनीतिक , राजनितिक और सामरिक दृष्टि से भारत की आत्मा को चोट पंहुचाने वाला है. कश्मीर का मसला इतना उलझा हुआ है कि इसपर  किसी भी तरह कि टिका -टिपण्णी करने से बाज आना चाहिए. <strong>प्रशांत भूषण</strong> को यह ज्ञात होना चाहिए कि कश्मीर की जनता की सोच के आधार पर कश्मीर का भविष्य तय नहीं किया जा सकता. क्योंकि वर्तमान समय की कश्मीरी आबादी ..कश्मीर की पहचान नहीं. क्योंकि इस आबादी में तीस  वर्ष पहले से कश्मीर से प्रताड़ित कर निष्काषित किये गए कश्मीरी पंडितों की गणना नहीं , जो आज तीस वर्षों बाद कम से कम दोगुनी तो अवश्य होती.</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरे की अगर ऐसी बात को जायज ठहराया जाया तो इसका स्पष्ट अर्थ है कि मुसलमानों की बढती आबादी भारत की अखंडता के लिए चुनती है ! कल मुसलमान बिहार में अगर ज्यादा हो जायें , तो बिहार या तो अलग पहचान मांगेगा या पाकिस्तान में चला जायेगा ? बंगाल को बांगलदेश में भेज दो .. ! क्या एक राष्ट्र के भागौलिक और राष्ट्रीयता की पहचान उसके आवाम के मर्जी से किया जाये ? अगर ऐसी नैतिक आग्रह को डेमोक्रसी का नाम दिया जाये , तो शायद डेमोक्रेसी को भी राष्ट्र के लिए एक नकारात्मक अव्यय के रूप में देखा जाना चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसी  बयानबाजी के पहले अरुंधती , गिलानी और इस <strong>प्रशांत भूषण </strong>जैसे सामाजिक पहचान रखने वालो को देश की नव -जागृत युवा की भावना का ख्याल     रखना चाहिए जो कश्मीर के आबादी के अनुपात में कई गुना बड़ा है. अगर कश्मीर के 1.25 करोड आबादी ( जिसमे 77 % मुसलमान तथा 20  % बचे हुए हिंदू हैं ) की भावना को 125 करोड हिंदुस्तानिओं की भावना और सुरक्षा से बड़ा माना जा सकता है ? अरुंधती जैसे बेहूदे और कलम की वेश्या को यह बात समझनी चाहिए कि  उसका &#8220;<strong>स्माल थिंग</strong> &#8221; (<strong> God of Small Thing ) तब &#8220;बिग थिंग &#8221; </strong>बन जाएगा अगर कश्मीर को अलग पहचान दे दी जाए . चीन और पाकिस्तान की मंसा और हालिया घटनाक्रम किसी से छुपा नहीं है. क्या कभी ऐसी बयानबाजी से पहले अरुंधती या प्रशांत ने यह सोचा कि ..कश्मीरी बोर्डर पर अपनी जान गँवा चुके और अपनी जान को दाव पर लगा रक्षा में लगे हजारों-लाखो भारतीय जवानो की शहादत और पीड़ा का क्या मोल लगा रहे हैं.  इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कश्मीर को अलग-थलग सोचने पर कश्मीर की स्थिति तिब्बत से अलग रहेगी. तब अरुंधती रो घर में घुस कर रेप भी किया जा सकता है और उसके बचने की कोई गुन्जाईस नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">वास्तव में इस हमले में चोटिल प्रशांत भूषण से गहरी सहानुभूति जताते हुए , बड़े अफसोस से कहा जा सकता है कि आपके प्रति हुए दुर्ववाहर की जितनी निंदा की जाये कम है. लेकिन <strong>तेजिंदर पाल </strong>जी और उनके साथिओं को यह बात समझनी चाहिए की <strong>प्रशांत भूषण</strong> जी एक बड़े  सामाजिक बदलाव के लिए संघर्षरत है , और अमूमन ऐसे बयान और आचरण के पीछे व्यक्ति स्पष्टवादी होने के लिए मजबूर होता है, भले ही निजी जीवन में वह अलग सोच भी रखता हो. प्रशांत जी के वर्तमान जीवन में ऐसी ही कई चुनौतियाँ होंगी और उनके सकारात्मक कार्यों की सूची कहीं ज्यादा लंबी है.</p>
<p style="text-align: justify;">परन्तु अरुंधती और गिलानी जैसे अभागे इस देश की धरती पर बोझ है , उन्हें सरेआम इसी तरह मारा जाना चाहिए. यह हिंदू की जाग्रति है, वर्षों से सुशुप्त हिंदू जब ऐसे कार्य करता है , तो सेक्युलरों और भारतीयता के दुश्मन बने तथकथित भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग बड़ा आहात हो उठता है. जबकि सच्चाई यह है , कि इन तीन युवाओं ने एक साफ़ सन्देश दिया है , कि चाहे वह नालायक गिलानी हो , या नरकवासी एम एफ हुसैन , या कलम की दलाल अरुंधती या हमारे अपने प्रशांत भूषण जी .. भारत के स्वाभिमान और अखंडता को चोट पहुचाने वाले के साथ अब इसी तरह से बर्ताव करने का समय आ गया है.हालाँकि <strong>प्रशांत भूषण </strong>के साथ किया गया व्यव्हार वास्तव में निंदनीय है , क्योंकि उनकी मंसा यह नहीं दिखती कि वह कश्मीर के अलग पहचान में यकीं रखते है.</p>
<p style="text-align: justify;">अगर आप चाहते हैं कि आपका सिस्टम सही कार्य करे , डेटा करप्ट न हो , सिस्टम हैंग न हो , फाइल सुरक्षित रहे ..तो हिंदू को एंटीवायरस के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा. यह अरुंधती प्रजाति देश के लिए वायरस है , जिसे डिलीट करना अत्यंत आवश्यक है.</p>
<p><strong><a href="http://www.youtube.com/watch?v=qQnV8zwa5xs">कश्मीर की आड़ में प्रशांत भूषण की कर दी पिटाई, सबने की निंदा- वीडियो</a></strong></p>
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		<title>जिन्दगी से परेशान हैं लोग इस जहान में,</title>
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		<pubDate>Sat, 08 Oct 2011 10:22:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>rawalkishore</dc:creator>
				<category><![CDATA[कविता]]></category>
		<category><![CDATA[Rawal Kishore]]></category>
		<category><![CDATA[जिन्दगी से परेशान]]></category>

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		<description><![CDATA[जिन्दगी से परेशान हैं लोग इस जहान में, जिन्दगी जी कर दिखाने वाला कोई-कोई है नफरत ही नफरत है हर दिल में आजकल पैगाम मोहब्बत के पढ़ने वाला कोई-कोई है दोस्त तो बहुत मिल जाते है हर राह में पर ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>जिन्दगी से परेशान हैं लोग इस जहान में,</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>जिन्दगी जी कर दिखाने वाला कोई-कोई है</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>नफरत ही नफरत है हर दिल में आजकल</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>पैगाम मोहब्बत के पढ़ने वाला कोई-कोई है</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>दोस्त तो बहुत मिल जाते है हर राह में</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>पर दोस्ती निभाने वाला कोई-कोई है</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>ना जिन्दगी चाहती है ना मौत मुझे</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>यहाँ रावल को समझ पाने वाला कोई-कोई है</strong></p>
<p style="text-align: center;"><strong>Rawal Kishore</strong></p>
<p style="text-align: center;">
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