Archive for category: शिक्षा

सर्वशिक्षा अभियान: कितना और कहां तक पूरा

सर्वशिक्षा अभियान: कितना और कहां तक पूरा

6 / October 15, 2010 1:19 pm

दिसम्बर 2010 तक सर्वशिक्षा अभियान द्वारा सभी बच्चों को साक्षर बनाना केंद्र सरकार का सपना था। कहना गलत न होगा कि सरकार का सपना चकनाचूर होता नजर आ रहा है।

गंभीर समस्या बन गया है विद्यालयों में दंड-समाचार पत्र

गंभीर समस्या बन गया है विद्यालयों में दंड-समाचार पत्र

0 / September 30, 2010 3:05 am

आजकल शिक्षा भी समाचार पत्रों में एक विचित्रा कारण से चर्चा में है। विभिन्न स्थानों से ये समाचार प्रकाशित हो रहे हैं कि फलां पाठशाला में शिक्षक ने छात्रा को

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दी- हिन्दी दिवस विशेष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दी- हिन्दी दिवस विशेष

0 / September 8, 2010 10:47 pm

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सदा से सब भारतीय भाषाओं तथा बोलियों का समर्थक रहा है। संघ की मान्यता है कि भारत में उपजी तथा विकसित हुई सभी भाषाएं राष्ट्रभाषा हैं और

निशंक राज में सशंकित शिक्षा

निशंक राज में सशंकित शिक्षा

0 / September 4, 2010 11:19 pm

‘नाश हो शिक्षे तेरा, ये तूने क्या कर दिया। बरसों पहले जब मैथिली दादा ने ये बात कही थी तो उनके मन में शिक्षा के भटकाव से उपजे संत्रास की

विश्वविद्यालय – ज्ञान की चुनौतियाँ

विश्वविद्यालय – ज्ञान की चुनौतियाँ

0 / August 31, 2010 6:40 am

क्या हमारे विश्वविद्यालय विश्व स्तर की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं? क्या विश्व स्तर और विश्व बाजार में अपना नाम रोशन कर सकते हैं? क्या हमारी शिक्षा की गुणवत्ता

रोजगार समाचार :बेरोजगारी दूर करने में सोनिया सरकार नाकाम

रोजगार समाचार :बेरोजगारी दूर करने में सोनिया सरकार नाकाम

9 / July 26, 2010 12:31 pm

1947 से 2009 तक के राजकाल पर यदि हम पैनी दृष्टि डालें तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि कांग्रेस राज में पूंजीपतियों, ब्यूरोक्रेटस, मुनाफाखोरों और बेईमानों ने ही

श्रम से चलता है ये जीवन :मानस खत्री की कविता

श्रम से चलता है ये जीवन :मानस खत्री की कविता

2 / May 25, 2010 11:55 pm

आपदाओं से मत घबराओ,
सदा इन्हें स्वीकार करो,
जीवन में कुछ करना है तो,
मेहनत से तुम काम करो.

पत्थर पिघल जाएंगे पल में,
मिटटी बन जाएगी सोना,
श्रम से चलता है ये जीवन
कुछ पाने को है, कुछ खोना

झूठ का फल :मानस खत्री

झूठ का फल :मानस खत्री

1 / May 23, 2010 10:35 pm

किसी शहर में एक धनि सेठ था. उसके दो बेटे थे, उनमें से एक बहुत ही गुणवान था तथा दूसरा अत्यधिक कामचोर. सेठ उन दोनों से बहुत प्यार से रहता था. एक दिन की बात है गुणवान बेटा कमाने के लिए बाहर चला गया. उसका गुण और दिमाग देख कर मालिक उसे काम पर रख लेता है. एक दिन छोटे बेटे के दिमाग में आता है, क्यों न मैं भी कुछ कमाऊँ

राजनीतिक हस्तक्षेप से निरंकुश होती पत्राकारिता से विनाश का खतरा बढ़ा

राजनीतिक हस्तक्षेप से निरंकुश होती पत्राकारिता से विनाश का खतरा बढ़ा

0 / May 18, 2010 8:43 pm

आज पत्रकार यह भूलता जा रहा है कि पत्रकार का सम्मान तो उसके द्वारा किये जाने वाले त्याग व तपस्या के कारण होता है। आदर्श पत्रकारिता तो पत्रकारों के द्वारा उठाये गये जोखिम, आदर्श, उददे्श्यों में ही पनपती है। गणेश शंकर विद्यार्थी तथा बाल गंगाधर तिलक इत्यादि ऐसे पत्राकारों में से थे जिन्होंने कभी पत्राकारिता के सिद्धान्तों के साथ समझौता नहीं किया। निरंकुश पत्राकारिता देश व समाज के विनाश का कारण बनती है।

भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों का रुख क्या हो ?

भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों का रुख क्या हो ?

0 / May 15, 2010 1:38 pm

भारत के लिए विश्व एकता और विश्व शांति का अपना संदेश देने के लिए भी यह विधेयक तथा इसमें निहित नीति सहायक होगी। आज की दुनिया 1947 की दुनिया नहीं है। यह शीत युद्ध की दुनिया भी नहीं है। अमरीका का प्रभुत्व भी तेजी से कम हो रहा है। दुनिया को नये नेतृत्व की तलाश है। चीन अभी सबसे ऊपर है। भारत, रूस, ब्राजील व दक्षिण अफ्रीका उस दोराहे पर खड़े हैं जहां से उन्हें उन्नति व नेतृत्व की नई राह पकड़नी है